BJP: यूं ही नहीं खिल रहा है देश में कमल, हिंदूवादी संगठनों का है बड़ा संबल!

अगले वर्ष होने वाले देश के सात राज्यों के विधानसभा चुनावों की रणभेरी बज चुकी है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 के लिए राजनीतिक दलों के साथ-साथ उनके संगठनात्मक नेटवर्क ने भी चुनावी तैयारी शुरू कर दी है।

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BJP leaders and opposition figures in a political context.
A visual representation of BJP leaders and opposition figures.

नरेश वत्स
BJP: अगले वर्ष होने वाले देश के सात राज्यों के विधानसभा चुनावों की रणभेरी बज चुकी है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 के लिए राजनीतिक दलों के साथ-साथ उनके संगठनात्मक नेटवर्क ने भी चुनावी तैयारी शुरू कर दी है। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने राज्य में संगठन और सरकार के बीच समन्वय को मजबूत करने की दिशा में काम तेज कर दिया है।(BJP)

हाल ही में लखनऊ में अवध और कानपुर प्रांत से जुड़े संघ और भाजपा पदाधिकारियों की बैठक में जमीनी स्थिति का फीडबैक लिया गया। बैठक में सामने आई चुनौतियों, सरकार और संगठन के बीच समन्वय तथा कार्यकर्ताओं की समस्याओं पर चर्चा हुई। विपक्ष की ओर से बनाए जा रहे राजनीतिक नैरेटिव का जवाब देना भी इस कवायद का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया जा रहा है। लेकिन इस पूरी गतिविधि के बीच उत्तर प्रदेश की 2027 की चुनावी लड़ाई का एक बड़ा सवाल सामने है। क्या भाजपा की ताकत सिर्फ पार्टी और संगठन है या उसके पीछे काम करने वाला व्यापक सामाजिक-संगठनात्मक नेटवर्क भी उसकी चुनावी क्षमता को बढ़ाता है?(BJP)

संघ का व्यापक नेटवर्क
भाजपा एक राजनीतिक दल है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन। इसके अलावा संघ परिवार से जुड़े विभिन्न संगठनों की अपनी-अपनी गतिविधियां और संगठनात्मक भूमिकाएं हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े संगठनों का नेटवर्क समाज के अलग-अलग वर्गों और क्षेत्रों में सक्रिय दिखाई देता है। विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे संगठनों की अपनी स्वतंत्र संगठनात्मक संरचनाएं हैं। लेकिन भाजपा को चुनाव जिताने के लिए ये संगठन जुट जाते है।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भाजपा के पास पार्टी संगठन के अलावा संघ से जुड़े कार्यकर्ताओं और विभिन्न सामाजिक संगठनों के साथ संवाद और समन्वय का एक लंबा अनुभव है। यही नेटवर्क चुनाव के समय भाजपा की जमीनी पहुंच को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण कारक बन जाता है।(BJP)

सिर्फ रैली और सोशल मीडिया से नहीं जीता जाता चुनाव
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में विधानसभा चुनाव की राजनीति केवल बड़े नेताओं की रैलियों और सोशल मीडिया अभियानों तक सीमित नहीं रहती। असली परीक्षा बूथ स्तर पर होती है। उदाहरण के रूप में मतदाता सूची से लेकर स्थानीय समस्याओं की जानकारी, घर-घर संपर्क, बूथ कमेटियों की सक्रियता और मतदान के दिन कार्यकर्ताओं की भूमिका इन सभी के लिए लगातार काम करने वाले संगठन की जरूरत होती है। भाजपा का संगठनात्मक मॉडल लंबे समय से बूथ स्तर की सक्रियता पर जोर देता रहा है। संघ का कैडर नेटवर्क इसके समानांतर सामाजिक स्तर पर संपर्क बनाए रखने की क्षमता रखता है।(BJP)

संघ-भाजपा समन्वय बैठक
यही कारण है कि चुनाव से काफी पहले होने वाले संघ-भाजपा समन्वय बैठकें सिर्फ औपचारिक बैठकें नहीं मानी जा सकतीं। इसका एक उद्देश्य यह भी है कि चुनावी मैदान में उतरने से पहले संगठन को जमीनी स्थिति की वास्तविक जानकारी मिल जाए।(BJP)

सरकार और संगठन में समन्वय जरुरी
इस बार संघ-भाजपा की कवायद का एक अहम पहलू कार्यकर्ताओं का फीडबैक है। सत्ता में लंबे समय तक रहने के बाद किसी भी राजनीतिक दल के सामने यह चुनौती रहती है कि उसके जमीनी कार्यकर्ता सरकार और प्रशासन से कितने संतुष्ट हैं। यदि कार्यकर्ता को लगता है कि सत्ता में उसकी बात नहीं सुनी जा रही या स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक व्यवस्था में उसकी शिकायतों का समाधान नहीं हो रहा, तो इसका असर संगठन की सक्रियता पर पड़ सकता है। यही कारण है कि संघ और भाजपा के बीच समन्वय में केवल चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं की नाराजगी और स्थानीय स्तर की शिकायतों को समझना भी महत्वपूर्ण हो गया है।(BJP)

विपक्ष के सामने चुनौती
अगर बात विपक्षी दलों की करें तो समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी के पास भी अपना संगठन और कार्यकर्ता तंत्र है। समाजवादी पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया है। पार्टी की कोशिश पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समूहों के सामाजिक आधार को बूथ स्तर के संगठन में बदलने की रही है। कांग्रेस भी उत्तर प्रदेश में अपने संगठन को निचले स्तर तक मजबूत करने की कोशिश कर रही है। बहुजन समाज पार्टी का भी अपना कैडर आधारित संगठन है। लेकिन भाजपा और दूसरे दलों की तुलना की जाए तो सवाल खड़ा होता है कि क्या विपक्षी दलों के पास भाजपा के समान लगातार सक्रिय रहने वाला व्यापक सामाजिक-संगठनात्मक तंत्र है?(BJP)

भाजपा बनाम इंडी गठबंधन
विपक्ष के लिए यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनावी गठबंधन और सामाजिक समीकरण अपने आप में पर्याप्त नहीं होते। गठबंधन मतों का गणित बदल सकता है, लेकिन उन मतों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने के लिए संगठन चाहिए। भाजपा के सामने यदि एक तरफ संघ का जमीनी नेटवर्क और दूसरी तरफ पार्टी की बूथ संरचना है, तो विपक्ष को भी अपने सामाजिक आधार को स्थायी संगठन में बदलने की चुनौती है। यानी 2027 की लड़ाई में मुकाबला केवल भाजपा बनाम विपक्ष नहीं होगा। एक स्तर पर यह संगठन बनाम संगठन की भी लड़ाई होगी।(BJP)

नैरेटिव की लड़ाई भी महत्वपूर्ण
आज चुनावी राजनीति में मतदाता तक पहुंचने के माध्यम बदल चुके हैं। सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और व्हाट्सएप जैसे माध्यम राजनीतिक संदेशों को तेजी से फैलाते हैं। लेकिन डिजिटल नैरेटिव तभी प्रभावी होता है, जब उसके साथ जमीन पर संगठन भी मौजूद हो। यही कारण है कि भाजपा के लिए विपक्ष के नैरेटिव का जवाब देना और अपने संगठन को सक्रिय रखना एक साथ चलने वाली प्रक्रिया है। विपक्ष के सामने दूसरी चुनौती यह है कि वह भाजपा के खिलाफ अपना राजनीतिक नैरेटिव बनाने के साथ-साथ उसे बूथ स्तर तक कैसे पहुंचाता है।(BJP)

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बूथ स्तर पर वास्तविक परीक्षा
उत्तर प्रदेश में 2027 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन दोनों पक्षों की तैयारी का स्वरूप धीरे-धीरे स्पष्ट हो रहा है।भाजपा और संघ के लिए चुनौती है कि सरकार की उपलब्धियों को संगठन के माध्यम से जनता तक पहुंचाया जाए, कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर की जाए और स्थानीय स्तर पर संगठन की सक्रियता बनी रहे। विपक्ष के लिए चुनौती इससे अलग है। सामाजिक आधार को स्थायी संगठन में बदलना, बूथ स्तर पर कार्यकर्ता तंत्र मजबूत करना और अपने राजनीतिक नैरेटिव को जमीन तक पहुंचाना। आखिरकार चुनाव के समय बड़े मंचों पर नेताओं की आवाज सबसे ज्यादा सुनाई देती है, लेकिन चुनावी मुकाबले की वास्तविक ताकत अक्सर उन कार्यकर्ताओं से तय होती है, जो बूथ तक पहुंचते हैं, मतदाता से संपर्क करते हैं और मतदान के दिन संगठन तथा कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखते हैं।(BJP)

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