उदय कुमार सिंह
Ganeshotsav: देशभर में गणेशोत्सव का पावन पर्व बड़े ही हर्षोल्लास और श्रद्धा-भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। 14 सितंबर से शुरू हुआ यह दस दिवसीय महाउत्सव 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति विसर्जन के साथ संपन्न होगा। सनातन परंपरा में भगवान श्री गणेश को विघ्नहर्ता, मंगलमूर्ति, गणनायक, एकदंत, लंबोदर और गजानन जैसे अनेक पावन नामों से पूजा जाता है। किसी भी शुभ कार्य, यज्ञ, पूजन, विवाह, गृहप्रवेश या व्यापार की शुरुआत से पहले ‘प्रथम पूज्य’ के रूप में गणपति का स्मरण करने की सर्वमान्य परंपरा है। वे केवल पूजा-पाठ के केंद्र नहीं, बल्कि बुद्धि, विवेक, विद्या और शुभ-लाभ के अधिष्ठाता देव हैं।(Ganeshotsav)
महाराष्ट्र से देश-विदेश तक
गणेश पूजा की परंपरा अत्यंत प्राचीन है, किंतु इसे सार्वजनिक और व्यापक सामाजिक उत्सव का रूप देने का ऐतिहासिक कार्य लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने किया। वर्ष 1893 में पुणे से तिलक ने सार्वजनिक गणेशोत्सव की नींव रखी। उनका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश शासन के दौरान धार्मिक आयोजनों के माध्यम से लोगों को एकजुट करना, सामाजिक समरसता बढ़ाना और राष्ट्रीय चेतना को जगाना था। समय के साथ यह पर्व महाराष्ट्र की सीमाओं को लांघकर पूरे भारतवर्ष और विदेशों में भी लोकप्रिय हो गया। आज मुंबई, पुणे, नागपुर से लेकर दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद और कोलकाता जैसे प्रमुख शहरों में भव्य सार्वजनिक पंडाल सजाए जाते हैं। इतना ही नहीं, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और मॉरीशस जैसे देशों में बसा भारतीय समुदाय भी गणेश चतुर्थी पर पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित कर अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ता है।(Ganeshotsav)
गणपति क्यों हैं प्रथम पूज्य?
भगवान गणेश के ‘प्रथम पूज्य’ बनने के पीछे पुराणों में एक बड़ा ही प्रेरक प्रसंग मिलता है। एक बार श्री गणेश और उनके बड़े भाई कार्तिकेय के बीच श्रेष्ठता को लेकर प्रश्न उठा। भगवान शिव ने दोनों के समक्ष शर्त रखी कि जो संपूर्ण ब्रह्मांड की परिक्रमा सबसे पहले करके लौटेगा, वही श्रेष्ठ माना जाएगा। कार्तिकेय अपने तीव्रगामी वाहन मयूर पर सवार होकर सृष्टि की परिक्रमा के लिए निकल पड़े। दूसरी ओर, गणेश जी का वाहन छोटा सा मूषक था। उन्होंने अपने बल और गति के बजाय बुद्धि और विवेक का प्रयोग किया। उन्होंने अपने माता-पिता (भगवान शिव और माता पार्वती) की परिक्रमा की और निवेदन किया कि उनके चरणों में ही संपूर्ण ब्रह्मांड समाहित है। उनकी इस बुद्धिमत्ता और पित्रभक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें सर्वप्रथम पूजे जाने का वरदान दिया। यह कथा संदेश देती है कि शारीरिक बल और गति से कहीं अधिक महत्व बुद्धि और सूझबूझ का होता है।(Ganeshotsav)
स्वरूप में छिपा जीवन-दर्शन
भगवान गणेश का प्रत्येक अंग मानव जीवन के लिए एक गहन सीख और संदेश समेटे हुए है:
-
विशाल मस्तक: व्यापक और दूरदर्शी सोच का प्रतीक है।
-
छोटी आंखें: सूक्ष्म दृष्टि और गहरी एकाग्रता का संकेत देती हैं।
-
बड़े कान: ‘शूप’ के समान बड़े कान धैर्यपूर्वक अधिक सुनने और व्यर्थ की बातों को छांटने की सीख देते हैं।
-
लंबोदर (विशाल पेट): जीवन में आने वाली हर अच्छी-बुरी परिस्थिति, दुख और आलोचनाओं को पचाने की क्षमता को दर्शाता है।
-
एकदंत (टूटा दांत): लक्ष्य के प्रति समर्पण, ज्ञान और त्याग का प्रतीक है।
-
वाहन मूषक: चंचल मन और भटकती इच्छाओं पर बुद्धि-विवेक द्वारा नियंत्रण पाने का संदेश देता है।
चार भुजाओं का रहस्य
गणपति की चार भुजाएं भी विशेष जीवन-दर्शन से जुड़ी हैं। उनके हाथों में सुशोभित ‘पाश’ सांसारिक आसक्तियों पर नियंत्रण, ‘अंकुश’ मन को सही दिशा देने, ‘मोदक’ ज्ञान से प्राप्त होने वाले आनंद और ‘अभय मुद्रा’ भक्तों पर कृपा व संरक्षण का प्रतीक मानी जाती है।(Ganeshotsav)
पौराणिक मान्यता
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महर्षि वेदव्यास ने महाभारत महाकाव्य की रचना की थी और भगवान गणेश ने अपनी अटूट निष्ठा और लेखन क्षमता से उसे लिपिबद्ध किया था। गणेश जी ने बिना रुके लिखने की शर्त निभाई, जिसने उन्हें विद्या, लेखन और परम ज्ञान के सर्वोच्च प्रतीक के रूप में स्थापित किया।(Ganeshotsav)
आस्था से सामाजिक व पर्यावरण चेतना
आज का आधुनिक गणेशोत्सव केवल व्यक्तिगत या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोकसंस्कृति, कला, सामुदायिक सहभागिता और सामाजिक चेतना का विस्तृत मंच बन चुका है। गणेशोत्सव के दौरान सार्वजनिक पंडालों में रक्तदान शिविर, स्वास्थ्य जांच, नाटक, संगीत सम्मेलन और सामाजिक जागरूकता अभियान आयोजित किए जाते हैं।(Ganeshotsav)
पर्यावरण-अनुकूल गणेशोत्सव
इसके साथ ही, पिछले कुछ वर्षों में ‘पर्यावरण-अनुकूल’ (Eco-Friendly) गणेशोत्सव की लहर तेजी से बढ़ी है। पीओपी (PoP) की मूर्तियों के स्थान पर मिट्टी (शाडू माटी) की प्रतिमाओं का उपयोग, प्राकृतिक रंगों का प्रयोग और कृत्रिम तालाबों में विसर्जन की व्यवस्था को प्राथमिकता दी जा रही है। यह पहल धार्मिक आस्था के साथ-साथ प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी को भी दर्शाती है।(Ganeshotsav)
ये भी पढ़ेंः BJP: यूं ही नहीं खिल रहा है देश में कमल, हिंदूवादी संगठनों का है बड़ा संबल!
सर्वत्र मंगल की कामना
गणेशोत्सव का यह पावन पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में किसी भी शुभ कार्य या यात्रा का शुभारंभ केवल उत्साह से नहीं, बल्कि श्रद्धा, बुद्धि और विवेक के साथ होना चाहिए। ‘गणपति बप्पा मोरया’ का उद्घोष विघ्नों के नाश, सामाजिक एकता और सर्वत्र मंगल की कामना की एक जीवंत अभिव्यक्ति है।(Ganeshotsav)

