Assembly Elections 2026: ममता के लिए खतरे की घंटी? ओवैसी-कबीर गठबंधन बिगाड़ेगा किसका खेल? क्या भाजपा के लिए साबित होगा वरदान?

ओवैसी और कबीर की " मामु" जिले मालदा और मुर्शिदाबाद पर खास नजर है । दोनों जिलों में 34 विधानसभा सीटें है जिसमे मालदा में 12 विधानसभा की सीटें और मुर्शिदाबाद में 22 सीटें है ।

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Political leaders in West Bengal's Assembly Elections 2026
A new political alliance emerges in West Bengal.

नरेश वत्स
Assembly Elections 2026:पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया प्रयोग सामने आया है असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने हुमायूं कबीर की जनता उन्नयन पार्टी के साथ चुनावी समझौता किया है। दोनों दल मिलकर 182 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। इसे राज्य में “मुस्लिम पहचान आधारित राजनीति” के नए प्रयोग के तौर पर देखा जा रहा है।(Assembly Elections 2026)

किन सीटों पर असर?
ओवैसी और कबीर की ” मामु” जिले मालदा और मुर्शिदाबाद पर खास नजर है । दोनों जिलों में 34 विधानसभा सीटें है जिसमे मालदा में 12 विधानसभा की सीटें और मुर्शिदाबाद में 22 सीटें है ।यह गठबंधन खासतौर पर मुस्लिम बहुल जिलों मालदा, मुर्शिदाबाद और बीरभूम की विधानसभा सीटों पर प्रभाव डाल सकता है। इन क्षेत्रों में कई सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका में हैं।(Assembly Elections 2026)

AIMIM का पिछला प्रदर्शन
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) का मॉडल पूरी तरह नया नहीं है। बंगाल विधानसभा का पिछला चुनाव भी ओवैसी ने लड़ा था लेकिन उसे कोई सफलता हासिल नहीं हुई थी । बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी ने सीमित लेकिन रणनीतिक तरीके से मुस्लिम प्रभाव वाली 29 सीटों पर चुनाव लड़ा और 5 सीटें जीतने में सफल रही। ओवैसी ने बिहार में लालू यादव की पार्टी राजद का खेल बिगाड़ दिया था । इस सफलता ने ओवैसी को बंगाल में भी इसी फार्मूले को आजमाने के लिए प्रेरित किया है।(Assembly Elections 2026)

संभावित असर: किसे फायदा?
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन ( AIMIM ) और जनता उन्नयन पार्टी के गठबंधन से दोनों पार्टियों को सीधा राजनीतिक स्पेस मिलेगा। ये गठबंधन मुस्लिम वोटों के एक हिस्से को “प्रतिनिधित्व की नई आवाज़” के नाम पर आकर्षित कर सकता है।यदि वोट ट्रांसफर सफल रहा तो कुछ सीटों पर किंगमेकर*या स्पॉइलर की भूमिका निभा सकते हैं।अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा को फायदा हो सकता है।मुस्लिम वोटों का बंटवारा होने पर कई सीटों पर भाजपा को कम वोट शेयर में जीत का मौका मिल सकता है।भाजपा पहले भी “वोट विभाजन” की रणनीति से लाभ उठाती रही है।(Assembly Elections 2026)

संभावित नुकसान: किसके लिए चुनौती?
तृणमूल कांग्रेस, जो अब तक मुस्लिम वोट बैंक पर मजबूत पकड़ रखती आई है, उसके लिए यह गठबंधन सीधी चुनौती है।ममता बनर्जी की पार्टी का कोर वोट बैंक कमजोर हो सकता है, खासकर सीमावर्ती और ग्रामीण सीटों पर। मुस्लिम आधारित नये समीकरण से कांग्रेस और वाम दलों को भी नुकसान संभव है। पारंपरिक मुस्लिम वोट, जो पहले कांग्रेस-वाम के साथ जाता था, अब और अधिक खंडित हो सकता है।(Assembly Elections 2026)

क्या सफल होगा यह प्रयोग?
बंगाल की राजनीति में पहचान आधारित राजनीति नई नहीं है, लेकिन AIMIM का यह मॉडल स्थानीय नेतृत्व और राष्ट्रीय मुस्लिम चेहरा के संयोजन पर आधारित है।हालांकि, बंगाल में “ध्रुवीकरण बनाम मुस्लिम दल ” की राजनीति के बीच यह प्रयोग कितना सफल होगा, लेकिन महत्वपूर्ण सवाल ये है कि क्या मुस्लिम वोटर “टैक्टिकल वोटिंग” छोड़कर नए विकल्प को अपनाएंगे?क्या यह गठबंधन सिर्फ वोट काटने वाला साबित होगा या सीट जीतने में भी सफल रहेगा?(Assembly Elections 2026)

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ओवैसी-कबीर गठबंधन बंगाल में तीसरी धुरी बन चुका है । इसका सीधा असर सीमित सीटों पर दिख सकता है, लेकिन राज्यव्यापी सत्ता समीकरण पर इसका प्रभाव “वोट कटवा” फैक्टर के रूप में अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।आने वाले चुनावों में यह साफ हो जाएगा कि यह प्रयोग बिहार की तरह सीमित सफलता दोहराता है।(Assembly Elections 2026)

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