Double Standard: कश्मीर घाटी से हाल ही में आई तस्वीरों ने देश के बुद्धिजीवियों और आम नागरिकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। युद्धग्रस्त ईरान और शिया बहुल क्षेत्रों की मदद के लिए कश्मीर के मुस्लिम समुदाय में जिस तरह का ‘जोश’ देखा जा रहा है, वह हैरान करने वाला है। जहां एक ओर अपने ही देश में आने वाली भीषण बाढ़, भूकंप या सैनिकों के कल्याण के लिए होने वाले फंड में यहां से शायद ही कभी ऐसी कोई ‘सामूहिक सक्रियता’ दिखी हो, वहीं विदेशी धरती के लिए पिगी बैंक से लेकर गहने तक दान किए जा रहे हैं।(Double Standard)
प्राप्त जानकारी के अनुसार पिछले दो दिन में ईरान की मदद के लिए 600 करोड़ रुएप जमा किए गए हैं। भारत के आज तक के किसी भी युद्ध में एक रुपए भी डोनेट न करने वाले इन जिहादियों की मानसिकता पर सवाल खड़े होते हैं।
मजहबी लगाव बनाम राष्ट्र के प्रति कर्तव्य
विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल मानवीय सहायता नहीं, बल्कि एक खास ‘मजहबी लगाव’ (Religious Affinity) का परिणाम है। ईरान के साथ शिया समुदाय का गहरा धार्मिक जुड़ाव जगजाहिर है। सवाल यह उठता है कि जब भारत के अन्य राज्यों में कोई प्राकृतिक आपदा आती है, तब यह सामुदायिक एकजुटता और ‘दान का जज्बा’ सीमा पार क्यों नहीं पहुँच पाता? क्या एक भारतीय नागरिक के तौर पर पहली प्राथमिकता अपने देशवासियों की मदद नहीं होनी चाहिए?(Double Standard)
सुरक्षा एजेंसियों की भी है नजर
इतने बड़े पैमाने पर बाइक बेचना, सोने के गहने और नकदी इकट्ठा करना अब सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर भी है। यह जांच का विषय है कि इस तरह के ‘क्राउडफंडिंग’ का जरिया क्या है और क्या यह पैसा सही हाथों में जा रहा है? जिस देश में रहकर सभी सुख-सुविधाओं का आनंद लिया जा रहा है, उसके प्रति उदासीनता और एक विदेशी ताकत के लिए इतना समर्पण, आम भारतीय के मन में खटास और अविश्वास पैदा करता है।(Double Standard)
इंसानियत का ‘चुनिंदा’ चेहरा
सोशल मीडिया पर भी लोग सवाल पूछ रहे हैं कि क्या इंसानियत केवल धर्म की सीमाओं में बंधी होती है? भारत ने हमेशा कश्मीर का साथ दिया है, लेकिन जब देश को उनकी जरूरत होती है, तब इस तरह की आर्थिक मदद की खबरें नदारद रहती हैं। ईरान के लिए उमड़ा यह प्यार यह साबित करता है कि कुछ लोगों के लिए ‘मजहब’ राष्ट्रहित और राष्ट्रीय संवेदनाओं से ऊपर है।(Double Standard)

