‘सावरकर’ हैं राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रतीक!

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी देश उन समस्याओं से जूझ रहा है जिसको लेकर स्वातंत्र्यवीर ने पहले से ही आगाह किया था। लेकिन सत्ताधारियों ने कभी इस ओर लक्ष्य ही नहीं दिया।

जिस मंत्र को देश की सरकार को स्वीकारने में सत्तर वर्ष लगे और उसने उसका अनुकरण करना शुरू किया वह मंत्र स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने स्वातंत्र्यकाल के पहले ही दे दिया था। फिर चाहे वह आसाम में घुसपैठ का प्रकरण हो, नागा विवाद रहा हो या चीन-पाकिस्तान विवाद… सभी पर स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने अपनी दूरदृष्टि से चिंतन किया और तत्कालीन नेताओं को समय-समय पर चेताया।

स्वातंत्र्यवीर सावरकर सैन्य शिक्षा को लेकर बहुत स्पष्ट विचार रखते थे। उनका मानना था कि सभी को सैन्य शिक्षा लेनी चाहिए। पारतंत्रकाल में एक समय ऐसा भी आया कि स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने साहित्यकारों से भी कह दिया कि आप सभी कलम छोड़कर बंदूकें हाथों में ले लें। इसका कारण था कि वे स्वतंत्र हिंदुस्थान के उस सपने के साकार करना चाहते थे जिसपर उन्होंने अपनी किशोर आयु से कार्य शुरू किया था।
स्वातंत्र्यवीर सावरकर भारत के यथार्थ हैं। उन्होंने जो कहा था देश आज भी उसी धुरी के आस पास घूम रहा है। कैसे? इसे कुछ घटनाओं से समझते हैं।

“वो मारते-मारते वीरगति को प्राप्त हो गए”
17 जून 2020 को प्रधानमंत्री मोदी ने देश संबोधित करते हुए कहा था कि, गलवान घाटी में हमारे जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। हमारे वीर मारते-मारते वीरगति को प्राप्त हुए हैं। प्रधानमंत्री का यह बयान कोई साधारण बयान नहीं था। ये बयान स्वातंत्र्यवीर की दृढ़ प्रतिज्ञा के शब्द थे। जो वर्ष 1897 के बाद वर्ष 2020 में दोहराए जा रहे थे। तभी तो कहते हैं इतिहास अपने आपको दोहराता है।
1897 में देश अंग्रेजों के अत्याचार, दमनकारी नीतियों से परेशान था। उस काल में क्रांतिवीर वासुदेव बलवंत फडके और चापेकर बंधुओं के बलिदान से नासिक के वीर विनायक सावरकर का मन उद्विग्न हो उठा और नासिक के पंद्रह वर्ष के किशोर वीर विनायक ने दृढ़ प्रतिज्ञा कर ली कि, मैं सशस्त्र क्रांति खड़ी करके छत्रपति शिवाजी महाराज जैसी विजय प्राप्त करूंगा या शत्रू को मारत-मारते अंतिम क्षण तक जूझता रहूंगा।
“मारिता-मारिता, मरेस्तो झुंजेन”

विदेशी सामानों का बहिष्कार
लद्दाख और अरुणाचल की सीमा पर चीन आंखे दिखाता रहा है। मई 2020 में उसने अचानक वास्तविक नियंत्रण रेखा पर दोनों देशों के बीच जो बफर जोन निर्धारित हुआ था उस पर कब्जा जमाना शुरू कर दिया। इसका उत्तर चीन को भारतीय सेना, केंद्र की सरकार ने भरपूर दिया। इसमें केंद्र सरकार ने चीन के सामानों पर भारत में प्रतिबंध लगाना शुरू कर दिया। इसके अंतर्गत वहां का तैयार माल भारतीय व्यापारियों ने खरीदना बंद कर दिया और जनता ने चीन के माल का बहिष्कार शुरू किया। इसके अलावा चीन के मोबाइल ऐप पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। इससे व्यापारी चीन को लाखो करोड़ का नुकसान हुआ। शत्रु को आर्थिक क्षति पहुंचाकर कमजोर करने की ये शिक्षा भारत को स्वातंत्र्यवीर सावरकर से मिली थी।
स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने 1905 में विदेशी कपड़ों की होलिका दहन की थी। इस कार्य में उन्हें बाल गंगाधर तिलक, कालकर्ते शिवरामपंत परांजपे का साथ मिला। इसके बाद तो इस आंदोलन में पूरा देश कूद पड़ा। अंग्रेजों को बहुत बड़ी आर्थिक क्षति उठानी पड़ी। इसकी क्षति की आंच सीधे लंदन तक पहुंच गई और भारत के कच्चे माल पर चलनेवाले मेनचेस्टर का उद्योग प्रभावित हुआ।

समान नागरिक संहिता
स्वतंत्रता प्राप्ति के लगभग 68 वर्ष बाद समान नागरिक संहिता को लागू किये जाने की मांग उठी है। इसके लेकर एक अधिवक्ता अश्वनी उपाध्याय ने दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। इसमें सभी धर्मों के पर्सनल लॉ में समानता लाने का मुद्दा शामिल है।
संविधान निर्माण काल में स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने जिस हिंदुत्व की व्याख्या की थी उसी के समर्थन में संविधान के शिल्पकार डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर भी थे। उन्होंने हिंदू कोड बिल का ड्राफ्ट तैयार किया था। उसमें यह बातें सम्मिलित थीं। इस काल में स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने कहा था कि सभी के अधिकार एक समान होंगे। हम अल्पसंख्यकों के दबाव में किसी को भी विशेष अधिकार नहीं देंगे। लेकिन इसे संविधान सभा ने अस्वीकार कर दिया और देश आज स्वतंत्रता के 74 वर्ष बाद उसकी कमी को झेल रहा है।

…तो दूर हो जाता आसाम का दर्द
आसाम में 1964-65 में पाकिस्तान (बांग्लादेश) से मुस्लिम घुसपैठ हुई थी। यह घुसपैठ 1971 तक जारी रही। इसने बाद में गंभीर रूप ले लिया। असम के मूल निवासियों ने इसके लिए विद्रोह का मार्ग अपनाया। ऑल असम स्टूडेंट यूनियन और ऑल असम गण परिषद ने आंदोलन चलाया। 1983 में नेल्ली में नरसंहार हुआ जिसमें लगभग तीन हजार लोगों की मौत हो गई। इसके बाद असम स्टूडेंट यूनियन, ऑल असम गण परिषद और सरकार के बीच 1985 में एक समझौते पर हस्ताक्षर हुआ। जिसके अनुसार 25 मार्च 1971 को आए सभी विदेशियों को बाहर खदेड़ने पर समझौता हुआ। नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (एनआरसी) को लेकर अंततोगत्वा 2015 में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद कार्य शुरू हुआ। असम की समस्या को स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने 1941 में ही पहचान लिया था।
उन्होंने 1941 में एक पत्रक निकाला था। इसमें उन्होंने चेताते हुए लिखा था,

“हिंदुस्थान के सभी हिंदुओं और विशेषकर असम की हिंदू जनता का अनिष्ट की ओर मैं लक्ष्य केंद्रित करना चाहता हूं। असम प्रांत को मुस्लिम बहुसंख्य करके वहां हिदुओं का जीना कठिन करने का कार्य हो रहा है। पिछले कई वर्षों से बंगाल और अन्य प्रांतों से मुसलमानों को लाकर असम में उनकी संख्या बढ़ाने का कार्य चल रहा…”

दुश्मन का दुश्मन अपना मित्र
भारत में होनेवाले मालाबार यु्द्धाभ्यास में इस बार अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने हिस्सा लिया था। क्वाड देशों के बीच हुए इस युद्धाभ्यास ने विस्तारवादी चीन को उसकी जगह दिखा दी। लद्दाख में भारत की सीमा में चीन लगातार घुसपैठ का प्रयत्न कर रहा था। दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। जून 2020 में गलवान घाटी में दोनों देशों के सैनिकों के बीच हुए संघर्ष में भारतीय सेना के बीस से अधिक जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। जबकि चीन के भी बड़ी संख्या में सैनिक मारे गए थे। चीन के संबंध अमेरिका से भी बिगड़े हुए थे, जापान से उसकी पुरानी दुश्मनी है जबकि ऑस्ट्रेलिया से भी उसकी खटपट हो गई थी। ऐसे में भारत ने स्वातंत्र्यवीर सावरकर के उस मंत्र को अपनाया जो उन्होंने 1940 में नेताजी सुभाषचंद्र बोस को दिया था। अर्थात दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। स्वातंत्र्यवीर सावरकर और नेताजी सुभाषचंद्र बोस के बीच चर्चा के बाद नेताजी ने अंग्रेजों के विरोधी रहे इटली, जापान और जर्मनी जैसे देशों से मित्रता स्थापित की। उन्होंने उस समय आजाद हिंद सेना में उन सैनिकों को सम्मिलित कर लिया जो अंग्रेजों के लिए इन देशों से लड़ते हुए पकड़े गए थे।

…तो यल्गार की आड़ में अब साजिशें न होती
पुणे में यल्गार परिषद के नाम पर प्रतिवर्ष कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। यह कार्यक्रम 1818 में पेशवाई को पराजित करने में ईस्ट इंडिया कंपनी के सहायक बने महार रेजीमेंट के सम्मान में मनाया जाता है। यह कार्यक्रम उस काल में सामाजिक कुरीतियों का परिणाम था। इसके विजयोत्सव को प्रतिवर्ष यल्गार परिषद के रूप में आयोजित किया जाता है। लेकिन इसका स्वरूप अब सामाजिक विद्वेश और अर्बन नक्सलियों के विचारों के मेले के रूप में बदल गया है। समाज को बांटनेवाले जाति-पांति के भेद के निर्मूलन के लिए स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने बहुत पहले ही कार्य शुरू कर दिया था।
स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने इसका सबसे बड़ा प्रयोग अपनी स्थानबद्धता काल में किया। उस काल में हिंदू समाज को सात बेड़ियों ने जकड़ रखा था। जिसमें सिंधू बंदी, स्पर्श बंदी, व्यवसाय बंदी, रोटी बंदी, बेटी बंदी, शुद्धि बंदी और वेद बंदी थी। हिंदुओं की प्रगति को अवरुद्ध करनेवाली इन बेड़ियों को तोड़ने का निश्चय सावरकर ने किया था और इसीलिए उन्होंने अपने पैरों का स्थानबद्धता की बेड़ियों में जकड़े जाना स्वीकार कर लिया। उन्होंने वहां पतित-पावन मंदिर में गर्भगृह में बैठकर समाज के अति-दलितों को बैठकर पूजा करने का अवसर दिलवाया। सावरकर ने अति-दलितों के उद्धार का भी कार्य किया। उनकी बस्तियों में जाकर उन्हें शिक्षा और स्वच्छता का महत्व समझाया। उनके लिए चुड़िहार का कार्य, बैंड पार्टी आदि के उद्योग शुरू कराए। उनके लिए जलपान गृह शुरू करवाए। सावरकर खुद जाकर वहां बैठते थे और सभी उस जलपान गृह का उपयोग करें इसकी कोशिश करते थे। जिस काल में महा-दलितों की परछाईं से भी बचा जाता था उस समय उन्होंने साथ बैठकर भोजन करने की व्यवस्था शुरू की। उस भोज में सम्मिलित होनेवालों का हस्ताक्षर लिया जाता था। उनके नाम समाचार पत्रों में छापे जाते थे। सावरकर ने पत्नी यमुनाबाई के सहयोग से महिलाओं को एकजुट करने के लिए हल्दी कुमकुम कार्यक्रम आयोजित किया। वेद पठन किसी विशेष समाज का एकाधिकार नहीं है बल्कि जो वेदों का अध्ययन करेगा वो वेद पठन-पाठन का अधिकारी होगा। इसके लिए अति-दलितों के बच्चों को वेद की शिक्षा दी, उन्हें वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में सहभागी करवाया और इन बच्चों ने स्पर्धाओं में विजय भी हासिल की। स्वातंत्र्यवीर के उन कार्यों को स्वतंत्र हिंदुस्थान की सरकार और नेताओं ने अंगीकार नहीं किया। अन्यथा परिस्थिति यल्गार प्रगति का होता, एकता का होता। क्रांति के नाम पर पढ़े-लिखे सभ्य समाज का प्रतिनिधित्व करने की दिखावा करनेवाले देश के प्रधानमंत्री पर ही हमले की योजना में सहभागिता न निभाते।

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