Burqa: दुनिया के दो सबसे पवित्र इस्लामी स्थलों मक्का और मदीना की चाबियां रखने वाली राजकुमारी अमीरा अल ताविल का पश्चिमी पहनावा चर्चा का विषय बन गया है। एक ओर, सऊदी अरब जैसे सख्त इस्लामी देश में शाही परिवार में महिलाओं के लिए इसे स्वतंत्रता का संकेत माना जाता है, वहीं दूसरी ओर, भारत में मुस्लिम महिलाओं में बुर्का के प्रति प्रेम आज भी जारी है। इन दो अलग-अलग दृष्टिकोणों के कारण एक बार फिर सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक विचारों पर चर्चा शुरू हो गई है।
सऊदी शाही परिवार में बदलाव और महिलाओं की आजादी
पिछले कुछ सालों में सऊदी अरब में बड़े सामाजिक बदलाव हो रहे हैं। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के नेतृत्व में देश में ‘विजन 2030’ के तहत कई सुधार किए जा रहे हैं। महिलाओं को गाड़ी चलाने का अधिकार, खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेने की अनुमति और सार्वजनिक स्थानों पर अधिक स्वतंत्र रूप से घूमने की अनुमति जैसे फैसले लिए गए हैं। इन बदलावों के तहत शाही परिवार की महिलाएं भी पारंपरिक पहनावे से आगे बढ़कर आधुनिक और पश्चिमी कपड़ों में नजर आने लगी हैं। यह बदलाव सऊदी समाज की बदलती विचारधारा का प्रतीक माना जा रहा है।
वॉल स्ट्रीट जनरल ने राजकुमारी अमीरा अल तावील का इंटरव्यू लिया। उस समय उनकी पोशाक कोट और पैंट थी। इस्लाम का मतलब प्यार और शांति है, यही सही मायने हैं। कुछ मुसलमानों ने इस्लाम को हाईजैक कर लिया है। खासकर 9/11 के हमलों के बाद दुनिया भर में इस्लाम की छवि को नुकसान पहुंचा है।
भारत में बुर्का पहनने की जिद
एक तरफ सऊदी राजकुमारी प्रगतिशील सोच से प्रेरित हैं और दुनिया भर के मुसलमानों को मुख्यधारा में लाने की कोशिश कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ भारत में मुस्लिम समुदाय में बुर्के के प्रति प्रेम और मजबूत होता जा रहा है। सऊदी राजकुमारी की पश्चिमी पोशाक और भारत में मुस्लिम महिलाओं का बुर्के के प्रति प्रेम दो अलग-अलग सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोणों को दर्शाता है। ये दोनों दृष्टिकोण प्रत्येक समाज की जरूरतों, ऐतिहासिक संदर्भ और धार्मिक व्याख्याओं पर आधारित हैं। सऊदी अरब में हुए बदलाव आधुनिकीकरण और वैश्वीकरण के प्रभाव को दर्शाते हैं, जबकि भारत की स्थिति परंपरा और धार्मिकता का मिश्रण है। ये चर्चाएँ प्रत्येक समाज को अपने मूल्यों और पसंद की स्वतंत्रता को फिर से परखने का अवसर देती हैं।
जब बुर्का जैसी प्रथाओं पर जोर बढ़ता है, जिससे महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और सामाजिक भागीदारी में बाधा आती है, तो इसे कट्टरपंथ की ओर झुकाव माना जाता है। ऐसी विचारधारा समाज में विभाजन पैदा कर सकती है और अल्पसंख्यक समुदायों को मुख्यधारा से अलग कर सकती है। कई उदार मुस्लिम बुद्धिजीवी भी इस तरह के कट्टरपंथ की निंदा करते हैं और तर्क देते हैं कि इस्लाम को लैंगिक समानता पर जोर देना चाहिए।
अन्य देशों में प्रतिबंध
कजाकिस्तान चेहरा ढंकने पर प्रतिबंध लगाने वाला एकमात्र देश नहीं है। दुनिया भर के कई देशों, जिनमें कुछ मुस्लिम बहुल देश भी शामिल हैं, ने इसी तरह के प्रतिबंध लागू किए हैं। मध्य एशिया में कजाकिस्तान के पड़ोसी किर्गिस्तान और उज्बेकिस्तान ने भी सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा ढंकने पर प्रतिबंध लगा दिया है। किर्गिस्तान ने 2025 की शुरुआत में नकाब पर प्रतिबंध लगा दिया, जबकि उज्बेकिस्तान ने 2023 में बुर्का के लिए जुर्माना लगाया।
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यूरोप में, फ्रांस, बेल्जियम, डेनमार्क, ऑस्ट्रिया और स्विट्जरलैंड जैसे देशों ने भी सार्वजनिक सुरक्षा और सामाजिक सद्भाव बनाए रखने के लिए पूरे चेहरे को ढकने वाले नकाब पर प्रतिबंध लगा दिया है। जहां कई इस्लामिक देशों ने बुर्का पर प्रतिबंध लगा दिया है, वहीं भारत में कॉलेज की छात्राएं भी बुर्का पहनने के लिए अदालत में याचिका दायर कर रही हैं, जो अब सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय है।
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