– विजय सिंगल
Bhagavad Gita: भगवद्गीता ने जीवन का मार्ग चिर आशा से प्रशस्त किया है।
अध्यात्म दर्शन के इस ग्रंथ में आश्वासन दिया गया है कि किसी को भी अपने
पिछले दुष्कर्मों के कारण निराश होने की आवश्यकता नहीं है । गलत काम
करने वाले हमेशा के लिए अभिशप्त नहीं हो जाते । हर किसी को नई शुरुआत
करने का अधिकार है। हृदय परिवर्तन से पापी भी संत बन सकता है। श्लोक
संख्या 9.29 से 9.31 तक श्रीकृष्ण ने अनन्य भक्ति और सच्चे संकल्प की
रूपान्तरणकारी शक्ति का वर्णन किया है। अर्जुन के साथ अपने संवाद में उन्होंने
कहा है:
“ मैं सभी जीवों में समान रूप से मौजूद हूं। मैं न तो किसी का मित्र हूं और
न ही शत्रु। लेकिन जो लोग भक्ति के साथ मेरी पूजा करते हैं , वे मुझमें रहते
हैं, और मैं उनमें रहता हूं ।“ (श्लोक 9.29)
“ यदि सबसे अधिक पापी व्यक्ति भी एकनिष्ठ भक्ति के साथ मेरी पूजा
करता है, तो उसे नेक समझना चाहिए, क्योंकि उसने नेकी के मार्ग पर चलने का
संकल्प लिया है ।“ (श्लोक 9.30) और
“ ऐसा व्यक्ति थोड़े ही समय में पुण्यशाली हो जाता है और इस प्रकार
शाश्वत शांति प्राप्त करता है। हे अर्जुन! यह निश्चय जान लो कि मेरा कोई
भक्त कभी भी अधोगति को प्राप्त नहीं होता “ । (श्लोक 9.31)
प्रथम दृष्टि में ये श्लोक एक दूसरे से असंगत प्रतीत होते हैं; क्योंकि
एक ओर तो भगवान को सबके प्रति निष्पक्ष बताया गया है, तथा दूसरी ओर
कहा गया है कि पापियों में भी पापी व्यक्ति भी भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करके
पुण्यात्मा बन सकता है। इस प्रकार ये श्लोक एक दूसरे के विरोधी प्रतीत होते
हैं। परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। गहन परीक्षण करने पर ये श्लोक वास्तव में
एक दूसरे के पूरक तथा परस्पर समन्वयात्मक प्रतीत होते हैं।
इन तीनों श्लोकों का सम्मिलित वाचन तथा सामंजस्यपूर्ण व्याख्या करने
पर पता चलता है कि भगवान सभी प्राणियों में एक ही हैं। उन्हें किसी से न तो
कोई मोह ही है , न ही कोई द्वेष। दूसरे शब्दों में, भगवान किसी का न तो पक्ष
लेते हैं न ही किसी का विरोध करते हैं । जब कोई भक्त इस तरह की समझ
प्राप्त कर लेता है , तो वह भगवान के साथ एकाकार हो जाता है। जैसे ही वह
भगवान के साथ एकाकार होता है , उसे उनसे दिव्य गुण प्राप्त होने लगते हैं।
निःस्वार्थ प्रेम, करुणा तथा सत्यनिष्ठा जैसे गुण उसमें स्वाभाविक रूप से आ
जाते हैं। जल्द ही ये गुण उसमें स्थापित हो जाते हैं, बावजूद इस तथ्य के कि
उसका अतीत अशांतिमय रहा था और पहले वह बुरे कार्यों में लिप्त रहा था।
जब कोई व्यक्ति प्रेम और भक्ति के साथ भगवान की पूजा करता है,
तो उसमें उनके प्रति अटूट आस्था विकसित होती है। इस तरह के भरोसे और
विश्वास के साथ, वह उनके सामने अपना दिल खोल देता है। वह अपनी सभी
गलतियों को स्वीकार करता है और अपने पिछली भूलों और कृत्यों के लिए
क्षमा मांगता है। वह दृढ़ संकल्प करता है कि वह फिर से ऐसे बुरे काम नहीं
करेगा। इस प्रक्रिया में, उसका दिल शुद्ध हो जाता है और उसके कर्म श्रेष्ठ हो
जाते हैं।
ऐसे व्यक्ति को , उसके अतीत को भूलकर, संत माना जाना चाहिए
क्योंकि उसने संतों के गुण अर्जित कर लिए हैं । जब कोई व्यक्ति ऐसे मूल्यों
को प्राप्त कर लेता है, तो वह अपने पिछले कर्मों के प्रतिकूल परिणामों या
अपराध की ग्लानि के भाय से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार, उसका अतीत उसे
दिन-रात पीड़ा नहीं देता। वह खुद और दुनिया के साथ शांति में रहता है। दूसरे
शब्दों में, वह शाश्वत शांति प्राप्त करता है।
उपर्युक्त श्लोकों की व्याख्या इस अर्थ में नहीं की जानी चाहिए कि
किसी के पिछले कर्मों या वर्तमान कृत्यों के परिणामों से आसानी से छुटकारा
मिल सकता है। कोई भी व्यक्ति कारण और प्रभाव के सिद्धांत को रद्द नहीं
कर सकता । किसी भी कारण को उसके प्रभाव पैदा करने से नहीं रोका जा
सकता। मनुष्य को अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है, परन्तु सच्चा भक्त
दुःख से बच जाता है, क्योंकि उसे ईश्वर की निष्पक्षता पर पूरा विश्वास होता है;
और इसलिए वह अपने पिछले कर्मों के दुःखद फल को भी सहर्ष स्वीकार कर
लेता है।
इन श्लोकों में आगे कहा गया है कि सुधारा हुआ पापी व्यक्ति अविलंब
पुण्यात्मा बन जाता है। इसका अर्थ केवल यह है कि जब कोई पापी व्यक्ति
शुद्ध हृदय से भगवान की ओर अभिमुख होता है, तो वह अपनी पिछली
गलतियों के लिए पश्चाताप करता है और भविष्य में अच्छे काम करने का दृढ़
संकल्प करता है। नए संकल्प के अनुसार किए गए अच्छे कर्म , कारण और
प्रभाव की अंतहीन श्रृंखला में, एक नया कारण जोड़ते हैं। ऐसे पुण्य कर्म और
उनके पुरस्कार पिछले दुष्कर्मों और उनके दंडों पर हावी हो जाते हैं। ऐसे व्यक्ति
को उसके अनैतिक अतीत के बावजूद पुण्यात्मा माना जाना चाहिए।
श्रीकृष्ण ने आश्वासन दिया है कि ईश्वर का सच्चा भक्त कभी
पतोन्मुख नहीं होता। एक सच्चा भक्त खुद को ईश्वर के रक्षक हाथों में सौंप
देता है। दैवीय प्रकाश हर समय उसका मार्गदर्शन करता है। संतों वाले गुणों को
प्राप्त करने के बाद , वह बुराई के आगे नहीं झुकता। शाश्वत शांति का आनंद
अनुभव करने के बाद, वह खुद को दुख के अंधेरे में नहीं गिरने देता। दूसरे शब्दों
में , वह कभी पतित नहीं होता। यहाँ यह बात दोहराना ज़रूरी है कि ऊपर लिखे
श्लोकों का यह मतलब कभी नहीं निकालना चाहिए कि पूजा-पाठ से किसी के
पाप धुल जाते हैं। कोई भी व्यक्ति जानबूझकर यह सोचकर पाप न करे कि
भक्ति से उसके पाप धुल जाएँगे।
निष्कर्ष के तौर पर, किसी को भी अपने अशांत अतीत के कारण कभी
भी उम्मीद नहीं खोनी चाहिए । ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति और धर्म के मार्ग
पर चलने का दृढ़ निश्चय एक पापी को भी संत में बदल सकता है। लेकिन यह
रूपान्तरण प्रकृति के नियमों में किसी मनमाने ईश्वरीय हस्तक्षेप के कारण नहीं,
बल्कि व्यक्ति के व्यवहार में सुधार के कारण होता है।
देखें यह वीडियो –
Join Our WhatsApp Community
