जानिये राम सेतु पर आया ये बड़ा निर्णय…

राम सेतु के निर्माण काल को लेकर आशंकाएं व्यक्त की जा रही थीं। इसे हिंदू धर्म में रामायण काल से जोड़कर देखा जाता है। यह पुल 48 किलोमीटर लंबा है। ऐसी मान्यता है कि 15वीं शताब्दी तक इस पर पैदल आवागमन सुलभ था।

भारत और श्रीलंका के मध्य फैली श्रृंखलाओं के रिसर्च के लिए केंद्र सरकार से मान्यता मिल गई है। यह श्रृंखला चूने के पत्थरों से बनी है। इसे राम सेतु, एडम्स ब्रिज या नाला सेतु के नाम से भी जाना जाता है।

भारत के दक्षिणी राज्य तमिलनाडु के रामेश्वरम् तट से मन्नार द्वीप तक फैले सेतु की भांति प्रतीत होनेवाले पत्थरों की श्रृंखला को राम सेतु कहा जाता है। यह श्रृंखला चूने के पत्थरों से बनी है। हिंदू मान्यताओं में इस सेतु को महत्वपूर्ण अंग माना जाता है। इसके महत्व को देखते हुए उस पर रिसर्च करने की मांग लंबे समय से की जा रही थी। इसके लिए अब सेंट्रल एडवाइजरी बोर्ड के आर्कियोलॉजिकल विभाग ने अनुमति दे दी है। यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) के अंतर्गत आता है।

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राम के काल से है सेतु का महत्व

राम सेतु का महत्व रामायण काल से संलग्न है। इसके रिसर्च का उद्देश्य अब रामायण काल की पूर्ण जानकारी प्राप्त करना है। इस रिसर्च में दो केंद्रीय एजेंसियां सम्मिलित हैं। ये काउंसिल फॉर इंडस्ट्रीयल रिसर्च (सीएसआईआर) और नेशलन इंस्टिट्यूट ऑफ ओशियनोग्राफी (एनआईओ) हैं। इसमें राम सेतु के निर्माण के काल को जानने के लिए रिसर्च होगा।

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रामायण काल को लेकर एक चर्चा होती रही है। इसको लेकर इतिहासकार पुरातत्ववेत्ता और वैज्ञानिकों में उत्सुकता रही है। जिसे अब रिसर्च होने का बाद आई रिपोर्ट से उत्तर मिल पाएगा।

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