-नरेश वत्स
UP Election 2027: अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों की राजनीति में एक तीसरा मोर्चा अब महज राजनीतिक अटकल नहीं, बल्कि बातचीत और बैठकों के स्तर पर आकार ले चुका है। इस गठजोड़ के बनने की खबरों से इंडी गठबंधन के दलों में चिंताओं की लकीरे खिंच गई है। हालांकि इसके औपचारिक गठन और सीटों के बंटवारे की अंतिम पुष्टि अभी बाकी है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के असदुद्दीन ओवैसी, आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर आजाद और अपनी जनता पार्टी के स्वामी प्रसाद मौर्य के बीच गठजोड़ की तैयारी है और सपा विधायक पल्लवी पटेल के भी इसमें शामिल होने की चर्चा है। 27 सितंबर को लखनऊ में औपचारिक घोषणा की संभावना बताई गई है। (UP Election 2027)
उत्तर प्रदेश में तीसरे मोर्चे की दस्तक ,ओवैसी-चंद्रशेखर-मौर्य-पल्लवी का ‘PDM’ प्रयोग, क्या बदलेगा चुनावी गणित?
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले प्रदेश की राजनीति में एक ऐसा समीकरण उभर रहा है, जो अब तक मुख्य रूप से भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच माने जा रहे मुकाबले को बहुकोणीय बनाने की क्षमता रखता है। असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम , चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी और स्वामी प्रसाद मौर्य की अपनी जनता पार्टी के साथ आने की चर्चा है। अपना दल (कमेरावादी) की नेता पल्लवी पटेल को भी इस संभावित गठबंधन में शामिल किए जाने की बात सामने आई है। (UP Election 2027)
इस संभावित मोर्चे का राजनीतिक आधार तीन बड़े सामाजिक समूहों मुस्लिम, दलित और पिछड़े वर्ग को एक मंच पर लाने की कोशिश है। ओवैसी मुसलमानों के नेता बनना चाहते हैं, चंद्रशेखर आजाद दलित राजनीति में अपनी स्वतंत्र पहचान मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि पल्लवी पटेल और स्वामी प्रसाद मौर्य के जरिए पिछड़े वर्गों के बीच राजनीतिक आधार बनाने की कोशिश में है। जैसा कि आप जानते है कि बिहार विधानसभा चुनावों में ओवैसी और चन्द्रशेखर आजाद ने कई चुनावी रैलियों में मंच साझा किया था। (UP Election 2027)
ओवैसी की रणनीति: मुस्लिम वोट के लिए नया राजनीतिक स्पेस
उत्तर प्रदेश में ओवैसी लगातार अपनी राजनीतिक जमीन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। जुलाई में उन्होंने अखिलेश यादव के सामने गठबंधन का प्रस्ताव भी रखा था और कहा था कि विपक्षी दलों को चुनाव से पहले साथ आकर भाजपा का मुकाबला करना चाहिए। लेकिन अखिलेश यादव ने ओवैसी के साथ गठबंधन को लेकर कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। लेकिन अगर ओवैसी, चंद्रशेखर आजाद और स्वामी प्रसाद मौर्य एक साथ आते हैं तो यह सिर्फ मुस्लिम राजनीति का प्रयोग नहीं रहेगा। इसका लक्ष्य मुस्लिम मतदाताओं के साथ दलित और पिछड़े मतदाताओं के लिए भी एक वैकल्पिक राजनीतिक मंच तैयार करना होगा। यही नये बन रहे तीसरे मोर्चे की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक परीक्षा होगी। क्या अलग-अलग सामाजिक आधार रखने वाले इन नेताओं का समर्थन एक साझा चुनावी गठबंधन में तब्दील हो सकता है? (UP Election 2027)
चंद्रशेखर की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण?
2024 के लोकसभा चुनाव में नगीना से चंद्रशेखर आजाद की जीत ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अलग पहचान दी। इसके बाद आजाद समाज पार्टी ने 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए संगठन और प्रत्याशी चयन पर काम शुरू किया है। पार्टी दलितों के साथ दूसरे सामाजिक समूहों को जोड़ने की रणनीति पर भी काम कर रही है। चन्द्रशेखर आजाद मायावती की पार्टी बसपा में सेध लगाने की रणनीति पर आगे बढ़ रहे है ।ऐसे में ओवैसी के साथ उनका आना मुस्लिम-दलित राजनीतिक साझेदारी का नया प्रयोग हो सकता है। लेकिन इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों दलों का संगठनात्मक नेटवर्क कितने विधानसभा क्षेत्रों में प्रभावी है और वे उस समर्थन को वोट में कितना बदल पाते हैं। (UP Election 2027)
स्वामी प्रसाद मौर्य और पल्लवी पटेल से ओबीसी कनेक्शन
तीसरा महत्वपूर्ण हिस्सा पिछड़ा वर्ग है। स्वामी प्रसाद मौर्य लंबे समय से उत्तर प्रदेश की पिछड़ी जातियों की राजनीति का जाना-पहचाना चेहरा रहे हैं। बसपा और भाजपा के बाद उन्होंने समाजवादी पार्टी का रुख किया, लेकिन 2024 में सपा से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई। अब उनका संभावित नया गठबंधन में शामिल होना अखिलेश यादव के सामने एक अलग राजनीतिक चुनौती का संकेत देता है। (UP Election 2027)
पल्लवी पटेल के शामिल होने की चर्चा इस समीकरण को ताकत मिल सकती है। वह अपना दल (कमेरावादी) की प्रमुख और सिराथू विधानसभा प्रयागराज जिले से विधायक हैं। 2024 में भी ओवैसी और पल्लवी पटेल के बीच पिछड़ा-दलित-मुस्लिम यानी पीडीएम सामाजिक समीकरण को लेकर प्रयोग हुआ था। (UP Election 2027)
सबसे बड़ा सवाल तीसरा मोर्चा किसे प्रभावित करेगा?
तीसरे मोर्चे का प्रभाव केवल इस बात से नहीं मापा जाएगा कि वह कितनी सीटें जीतता है। ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि वह किस-किस विधानसभा क्षेत्र में भाजपा, सपा या अन्य दलों के वोटों को प्रभावित करता है।यदि मोर्चा मुस्लिम-दलित-पिछड़ा सामाजिक गठजोड़ को कुछ क्षेत्रों में प्रभावी ढंग से संगठित करता है, तो उन सीटों पर सपा के पारंपरिक सामाजिक आधार पर असर पड़ सकता है। दूसरी तरफ यदि उसका प्रभाव सीमित सामाजिक समूहों या चुनिंदा क्षेत्रों तक रहता है, तो उसका चुनावी परिणाम अलग होगा।भाजपा के लिए भी इसका महत्व है, क्योंकि समाजवादी पार्टी 2027 के लिए गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित मतदाताओं के बीच अपना आधार बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है। ऐसे में तीसरे मोर्चे का सामाजिक आधार और सपा की नई विस्तार रणनीति कई क्षेत्रों में एक-दूसरे से टकरा सकती है। (UP Election 2027)
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उत्तर प्रदेश चुनाव अब सिर्फ दो ध्रुवों की कहानी नहीं?
ओवैसी, चंद्रशेखर आजाद, स्वामी प्रसाद मौर्य और संभावित रूप से पल्लवी पटेल का एक मंच पर आना 2027 के चुनाव की सामाजिक इंजीनियरिंग को नया आयाम दे सकता है।उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में असली सवाल अब यह नहीं है कि तीसरा मोर्चा बन रहा है या नहीं। सवाल यह है कि क्या मुस्लिम-दलित-पिछड़ा समीकरण कागज से निकलकर बूथ तक पहुंच पाएगा? यही तय करेगा कि यह गठबंधन केवल चुनावी प्रयोग बनकर रह जाता है या प्रदेश के बहुकोणीय मुकाबले में स्थायी राजनीतिक स्पेस बनाने की कोशिश करता है। (UP Election 2027)
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