Maharashtra: शिवसेना चुनाव चिन्ह विवाद, पार्टी और धनुष-बाण किसका; जानें सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि यह मुद्दा लंबे समय से लंबित है और अनिश्चितता को जारी नहीं रखा जा सकता।

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महाराष्ट्र (Maharashtra) की राजनीति में भूचाल लाने वाले शिवसेना चुनाव चिह्न विवाद (Shiv Sena Election Symbol Dispute) का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सोमवार (14 जुलाई) को उद्धव ठाकरे गुट (Uddhav Thackeray Faction) की याचिका (Petition) पर सुनवाई (Hearing) अगस्त तक के लिए टाल दी है। यह याचिका महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर द्वारा एकनाथ शिंदे गुट को ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न आवंटित करने के फैसले को चुनौती देती है।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि यह मुद्दा लंबे समय से लंबित है और अनिश्चितता को जारी नहीं रखा जा सकता। पीठ ने उद्धव गुट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल से कहा कि वे मुख्य मामले के अंतिम निपटारे के लिए अगस्त में तारीख तय करेंगे। सिब्बल ने इस पर स्थानीय निकाय चुनावों का हवाला देते हुए जल्द सुनवाई की मांग की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे ठुकरा दिया।

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बहुमत के आधार पर चुनाव चिन्ह
शिंदे गुट के वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने दलील दी कि अदालत ने पहले भी इस मुद्दे पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया था। सिब्बल ने अपनी बात दोहराते हुए कहा कि विधानसभा अध्यक्ष का 2023 में विधायी बहुमत के आधार पर विपक्षी पार्टी को चुनाव चिन्ह सौंपने का फैसला सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले के विपरीत है।

इससे पहले 7 मई को भी सुप्रीम कोर्ट ने उद्धव ठाकरे गुट से स्थानीय निकाय चुनावों पर ध्यान केंद्रित करने को कहा था, बजाय इसके कि वे चुनाव चिह्न को लेकर तत्काल सुनवाई की मांग करें। अदालत ने तब कहा था कि मामले की सुनवाई ग्रीष्मावकाश के बाद की जाएगी।

अध्यक्ष के आदेशों को चुनौती
गौरतलब है कि 10 जनवरी 2024 को महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर ने शिंदे सहित सत्तारूढ़ खेमे के 16 विधायकों को अयोग्य ठहराने की शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) की याचिका खारिज कर दी थी। उद्धव गुट ने विधानसभा अध्यक्ष के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें दावा किया गया है कि यह “स्पष्ट रूप से गैरकानूनी और विकृत” है और दलबदलुओं को दंडित करने के बजाय उन्हें पुरस्कृत किया गया है।

सबकी निगाहें कोर्ट के फैसले पर टिकी हैं
यह मामला महाराष्ट्र की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है, खासकर आगामी स्थानीय निकाय चुनावों के मद्देनजर। दोनों गुटों के लिए चुनाव चिह्न का स्वामित्व मतदाताओं पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है, खासकर ग्रामीण इलाकों में, अब सुप्रीम कोर्ट का अगस्त में इस मामले की सुनवाई करना, महाराष्ट्र के राजनीतिक परिदृश्य पर और अधिक प्रभाव डालेगा।

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