Lok Sabha Election 2024: पंजाब की राजनीति में उग्रवाद का साया, चुनाव में उतरे तीन खालिस्तानी?

पंजाब में हिंसा का एक ऐसा दौर था जब राजनेता, पत्रकार और यहां तक ​​कि वरिष्ठ अधिकारी भी राज्य में सुरक्षित नहीं थे।

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– अंकित तिवारी 

Lok Sabha Election 2024: पंजाब (Punjab) में हिंसा (Violence) और राजनीति (Politics) का संबंध कोई नई बात नहीं हैं। अपने शुरुआती दिनों से ही शिरोमणि अकाली दल (Shiromani Akali Dal) जैसे पंथ राजनीति में हावी रहें हैं। इस कारण आगे चल कर उग्रवाद और हिंसा का एक ऐसा दौर भी आया, जब पंजाब में राजनेता (Politician), पत्रकार (Journalist) से लेकर वरिष्ठ अधिकारी (Senior Official) तक सुरक्षित (Safe) नहीं थे। इसमें सबसे बड़ा नाम दमदमी टकसाल के ग्रंथि रहे जरनैल सिंह भिंडरावाले है। मारे गए उग्रवादी नेता जरनैल सिंह भिंडरावाले की तस्वीरें यूरोप, कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के कुछ गुरुद्वारों में लगाना आम बात है। इनके साथ ही तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के हत्यारों की तस्वीरें भी लगाई गई हैं।

डुप्लीकेट भिंडरावाले
जेल में बंद खालिस्तान समर्थक अमृतपाल सिंह पंजाब की खडूर साहिब सीट से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में लोकसभा चुनाव लड़ेंगे। उनकी मां बलविंदर कौर ने 26 अप्रैल को इसकी पुष्टि की। पंजाब की सभी 13 लोकसभा सीटों पर सात चरण के आम चुनाव के आखिरी चरण में 1 जून को मतदान होगा। वोटों की गिनती 4 जून को होगी। अमृतपाल के खिलाफ शिरोमणि अकाली दल (SAD) से विरसा सिंह वल्टोहा, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से पूर्व मुख्य संसदीय सचिव मंजीत सिंह मन्ना, आम आदमी पार्टी (आप) से तीन बार के पूर्व विधायक लालजीत सिंह भुल्लर और कांग्रेस पार्टी से पूर्व विधायक कुलबीर सिंह जीरा मैदान में हैं।

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किसान आंदोलन में रहा था शामिल
31 वर्षीय अमृतपाल सिंह अमृतसर जिले के जल्लूपुर खेड़ा का रहने वाला है। उनका परिवार कथित तौर पर दुबई में एक परिवहन व्यवसाय चलाता है और अमृतपाल 2012 से वहां रह रहा था। केंद्र के कृषि कानूनों (अब निरस्त) के खिलाफ किसानों के साल भर के विरोध प्रदर्शन के दौरान, अमृतपाल भारत लौटा यात्रा की और आंदोलन में शामिल हुए। अमृतपाल सिंह का जन्म सिख आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले के सैन्य अभियान में मारे जाने के नौ साल बाद सिख समुदाय के सबसे पवित्र धर्म स्थल स्वर्ण मंदिर में हुआ था। स्टाइल से लेकर व्यवहार तक, अमृतपाल खुद को भिंडरावाले के अनुयायी के रूप में पेश करता है। पंथ नेता की तरह, वह भी एक तलवार रखता है और सशस्त्र रक्षकों के साथ चलता है। हालांकि मतभेद बहुत हैं। भिंडरावाले एक कट्टर धार्मिक नेता, रूढ़िवादी सिख संगठन, दमदमी टकसाल का प्रमुख था। वारिस पंजाब दे से पहले, अमृतपाल की कोई धार्मिक पृष्ठभूमि नहीं थी।

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खालिस्तान के आखिरी झंडाबरदार
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हत्यारों में से एक दिवंगत बेअंत सिंह के 45 वर्षीय बेटे सरबजीत सिंह ने पंजाब की फरीदकोट सीट से लोकसभा चुनाव लड़ने का इरादा जताया है। यह कहते हुए कि फरीदकोट के कई लोगों ने उनसे चुनावी मैदान में उतरने का आग्रह किया है, सरबजीत ने पुष्टि की है कि वह एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव में भाग लेंगे। बेअंत सिंह और सतवंत सिंह, जो तत्कालीन प्रधान मंत्री के अंगरक्षक थे, ने 31 अक्टूबर 1984 को उनके आवास पर इंदिरा गांधी की हत्या कर दी। तब बेअंत सिंह को सुरक्षा गार्डों ने मौके पर ही मार डाला था, जबकि सतवंत सिंह को बाद में मौत की सजा सुनाई गई और बाद में फांसी दी गई थी। 1989 के लोकसभा चुनाव में सरबजीत की मां बिमल कौर रोपड़ सीट से सांसद चुनी गई थीं। उनके दादा उसी वर्ष बठिंडा से सांसद चुने गए थे।

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एक बार फिर से सक्रिय
एक सख्त पुलिस अधिकारी जिसने कभी पंजाब में ड्रग तस्करों पर नकेल कसी थी, एक कट्टरपंथी सिख नेता जो खालिस्तान की वकालत करता है। एक लोकसभा सांसद, जिन्हें एक बार संसद में कृपाण ले जाने से रोक दिया गया था। सिमरनजीत सिंह मान पिछले कुछ वर्षों में कई अलग-अलग रूप में नजर आते रहे हैं। 2022 में लगभग दो दशकों तक चुनावी हाशिए पर रहने के बाद, 77 वर्षीय मान ने एक बार फिर पंजाब में राजनीतिक महत्व हासिल कर लिया है। वे शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) के अध्यक्ष हैं, जो बादल परिवार के नेतृत्व वाले शिरोमणि अकाली दल से अलग हुआ गुट है। आम आदमी पार्टी के नेता और पंजाब के मुखयमंत्री भगवंत मान के लोकसभा सीट संगरूर पर हुए उप चुनाव में अपनी जीत दर्ज की। हैरानी की बात ये थी की हाशिए पर जा चुके खालिस्तान समर्थक नेता एक बार फिर से सक्रिय होते दिख रहे है।

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चुनावी गुना गणित
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 2004 और 2019 के बीच, सिमरनजीत मान सभी लोकसभा चुनाव लड़े, लेकिन उनके वोटशेयर में लगातार गिरावट देखी गई। 2004 में, वह 26 प्रतिशत वोटों के साथ संगरूर में तीसरे स्थान पर रहे। पिछले चुनावों में 41.7 प्रतिशत से कम और 2009 में, वह पांचवें स्थान पर चले गये तथा 3.62 प्रतिशत मामूली वोट शेयर रहा। कुछ राजनीतिक विशेषज्ञ और पर्यवेक्षक यह भी बताते हैं कि 2020 में शुरू हुआ किसान आंदोलन ने पंजाब के कई हिस्सों में पुरानी कट्टरपंथी भावनाओं को जन्म दिया, जिससे केंद्र, सिख-केंद्रित राजनीतिक आवाजों के लिए अधिक जगह बन गई।

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आईपीएस में करियर और एक उग्रवादी मोड़
सिमरनजीत मान उस परिवार से हैं, जिसे राजनीतिक रूप से सशक्त परिवार कहा जा सकता है। उनके पिता लेफ्टिनेंट कर्नल जोगिंदर सिंह मान (सेवानिवृत्त), अकाली दल के नेता, 1960 के दशक के अंत में पंजाब विधानसभा के अध्यक्ष के रूप में कार्यरत थे। उनकी पत्नी गीतिंदर कौर मान परनीत कौर की छोटी बहन हैं, जो पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की पत्नी हैं। मान ने अपना करियर भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के 1967-बैच अधिकारी के रूप में शुरू किया, लेकिन अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में बंद खालिस्तानी अलगाववादियों के खिलाफ सेना के ऑपरेशन ब्लू स्टार के विरोध में पद से 1984 में इस्तीफा दे दिया। मान 1984 और 1989 के बीच जेल में थे। 1989 के अंत में, वह 100 से अधिक सिख कैदियों में से एक थे, जिन्हें केंद्र सरकार ने सभी आरोप हटाकर बिना शर्त रिहा कर दिया था। लेकिन अब भी वह 6 जून को, जिस दिन सैनिकों ने स्वर्ण मंदिर के परिसर में कार्रवाई की थी, मान अपने समर्थको के साथ इकट्ठा होते रहते हैं और खालिस्तान समर्थक नारे लगाते रहते है।

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खालिस्तान समर्थकों का सम्मान
अमृतसर की सड़कों पर, छोटे खुदरा स्टोर खुलेआम भिंडरावाले का चेहरा छपी टी-शर्ट बेचते हैं। स्टालों पर 1980 और 1990 के दशक के सुरक्षा अभियानों में मारे गए सिख चरमपंथियों की तस्वीरों वाले कैलेंडर भी उपलब्ध हैं। हालांकि पिछले कुछ चुनावों में उग्रवादी नेताओं के लिए पंजाब के युवाओं में उत्साह कम देखा गया है। लेकिन 2022 में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद पंजाब में उग्रवादी समर्थन का एक नया दौर देखा जा रहा है। इनमें अमृतपाल सिंह बेहद खास है। वह खुद को पंजाब के बेटा और खालिस्तान समर्थक बताता है।

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