Mother tongue: 1915 में, जब वीर सावरकर अंडमान में अपनी सज़ा काट रहे थे, कोल्हू खींच रहे थे, तभी उन्होंने सुना कि तेलंगाना में ‘आंध्र माता की जय’ के नारे लग रहे हैं। उस समय उन्होंने कहा था, “मुझे लगता है कि यह खतरे की घंटी है। क्योंकि अंग्रेज हमें पहले ही जाति और धर्म के आधार पर बांट चुके हैं। अब वे हमें प्रांत और भाषा के आधार पर बांटेंगे। भविष्य में यही होने वाला है। पिछले 10 वर्षों का इतिहास देखें, तो हर राज्य अपनी भाषा को लेकर जिद करता नज़र आता है। अपनी भाषा पर अभिमान होना चाहिए लेकिन उस पर दुराभिमान नहीं होना चाहिए। यह दुराभिमान अब काफ़ी हद तक बढ़ने लगा है।” ये बात स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक के कार्याध्यक्ष और वीर सावरकर के पोते रणजीत सावरकर ने कही है।
रणजीत सावरकर ने आगे कहा, “भाषा विवाद ने समाज को बांटना शुरू कर दिया है। हमारा दुश्मन देश इसका फायदा उठा रहा है। यह बहुत गलत है। सभी भारतीय भाषाओं का उद्गम संस्कृत से है। संस्कृत के प्रमुख ग्रंथ जो हैं, वे सबसे पहले तमिल में लिखे गए थे। तब भी, देवनागरी लिपि नहीं थी। जो अवशेष हमें मिल रहे हैं, वे संस्कृत में हैं।”
रणजीत सावरकर ने यह क्रांतिकारी विचार सामने रखते हुए कहा, “अपने स्वार्थ के लिए भाषा के नाम पर विवाद खड़ा किया जा रहा है। जो लोग यह विवाद पैदा कर रहे हैं, उनके बच्चे अपनी मातृभाषा में शिक्षा नहीं ले रहे हैं। अगर आपको अपनी भाषा पर अभिमान है, तो अपनी भाषा को ज्ञान की भाषा के रूप में प्रचारित किया जाना चाहिए। आज आप जहां भी जाएं, चाहे वह जापान हो, जर्मनी हो, फ्रांस हो, चीन हो, रूस हो, अंग्रेजी में शिक्षा नहीं दी जाती। अगर आपको सचमुच अपनी भाषा पर अभिमान है, तो आपको अपने बच्चों को उसी भाषा में पढ़ाना चाहिए। क्योंकि बच्चों की ग्रहण शक्ति उनकी मातृभाषा में अधिक होती है। लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगे, वे केवल राजनीति करेंगे और अपने बच्चों को यूरोप पढ़ने भेजेंगे।”
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