राधा रमण
INDI Alliance: राजनीति की डगर उबड़-खाबड़ होती है, पथरीली होती है। चिलचिलाती धूप में चलना होता है। सड़क पर विरोध-प्रदर्शन करना होता है। नारेबाजी करनी होती है, जेल जाना होता है और जरूरत पड़ने पर पुलिस की लाठियां भी खानी पड़ती है। वातानुकूलित कमरों में बैठकर तो सिर्फ मीठी-मीठी बातें होती है। क्या आपको लगता है कि देश के सियासी दल खासकर विपक्ष के दल सड़क पर उतरने की हालत में हैं? मुझे तो ऐसा नहीं लगता।(INDI Alliance)
नेता भी वही, मुद्दे भी वही
लगभग दो वर्ष बाद विपक्षी दलों के गठबंधन की बैठक नई दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में हुई, जिसमें पांच मुद्दों पर सहमति की बात कही गई। बैठक के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने बताया कि इंडिया गठबंधन के नेता मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण (एसआईआर), वोटर लिस्ट में हेरफेर और चुनाव की निष्पक्षता पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को चिट्ठी लिखेंगे। इसके अलावा बैठक में शिक्षामंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की गई। देश में आर्थिक स्थिति की बदहाली, बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई और किसानों के मसले पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की सरकार से मांग की गई।(INDI Alliance)
बेअसर सरकार
अब इसका विश्लेषण करते हैं। एसआईआर को लेकर पहले भी विपक्ष के कई दल सुप्रीम कोर्ट जा चुके हैं और मुंह की खाकर लौटे हैं। अब सीजेआई को पत्र लिखने से क्या नया हो जाएगा? नीट पेपर लीक और सीबीएसई 12वीं बोर्ड की नई ऑनस्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) को लेकर राहुल गांधी लंबे समय से शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। अभी तक इस्तीफा नहीं मिला। मिलने की उम्मीद भी कम है क्योंकि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह 2015 में ही स्पष्ट कर चुके हैं कि यह सरकार इस्तीफा देने वाली नहीं है। तबसे सरकार उसी लकीर पर चल रही है। बीच में कई मामले आए, चाहे वह तत्कालीन गृह राज्यमंत्री अजय मिश्र टेनी का मामला हो, मंत्री कौशल किशोर का हो, बंदी संजय का हो, ब्रजभूषण शरण सिंह का हो अथवा हरदीप पुरी का हो, पिछले 12 वर्षों में एमजे अकबर के अलावा किसी ने इस्तीफा नहीं दिया है। अकबर का मामला भी अपवाद कहा जा सकता है क्योंकि प्रधानमंत्री ने उनसे इस्तीफा नहीं मांगा था। मीटू में नाम आ जाने और चरित्र हनन से आजिज आकर उन्होंने खुद ही पद छोड़ दिया था।(INDI Alliance)
किसी भी क्षेत्र के लिए कोई रोडमैप नहीं
अब बात सर्वदलीय बैठक बुलाने की करते हैं। अगर विपक्ष के पास देश की बदहाल आर्थिक स्थिति से निकलने, महंगाई पर अंकुश लगाने, बेरोजगारी दूर करने और किसानों की आय बढ़ाने का कोई रोडमैप है, तो उसे जनता को बताना चाहिए। हो सकता है सरकार भी उससे सीख लेती। फिर क्या सरकार इन मुद्दों के प्रति गंभीर नहीं है? कृषि मंत्री संसद के पिछले सत्र में ही कह चुके हैं कि सरकार के प्रयास से किसानों की आय दोगुनी हुई है। तब संसद में बैठे विपक्ष के लोग क्या कर रहे थे। यह अलग बात है कि किसान अपनी बदहाली और बढ़ते कर्ज के कारण आत्महत्या कर रहे हैं।(INDI Alliance)
आगे भी जारी रहेगी बैठक
विपक्षी गठबंधन की बैठक में यह भी तय किया गया कि गठबंधन के नेता हर दूसरे महीने मिलते-बैठक करते रहेंगे और मानसून सत्र के दौरान नेता प्रतिपक्ष के कार्यालय में रोज बैठक करंगे। करिए, किसने रोका है? लेकिन इससे क्या हो जाएगा? देश में विपक्षी गठबंधन के नेताओं के पास सरकार के विरोध का कोई रोडमैप नहीं है। जिन क्षेत्रीय दलों के सहयोग से कांग्रेस राजनीतिक लड़ाई का व्यूह रचना चाहती है, उनका वजूद कांग्रेस के पुराने वोटरों से ही तो है। क्या वे अपना वोटबैंक कांग्रेस के लिए कुर्बान करेंगे? फिर क्या विपक्षी गठबंधन के किसी नेता ने कभी सड़क पर उतरने और जेल भरो आंदोलन करने कोशिश की है? नहीं।(INDI Alliance)
सोशल मीडिया के इस्तेमाल कर क्रांति का सपना
आज के नेता चाहे राहुल गांधी हों या अखिलेश यादव, तेजस्वी हों या कोई और, सभी सोशल मीडिया पर पोस्ट करके क्रान्ति करना चाहते हैं। नेताओं के इसी आरामतलब व्यवहार के चलते निष्ठावान कार्यकर्ता घर बैठ गए हैं। सभाओं में किराये की भीड़ जुटाई जाती है। यही कटु सत्य है। याद कीजिए, 1974 में विपक्ष के नेताओं ने जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में लामबंद होकर आंदोलन किया था। सड़कों पर उतरे थे, पुलिस की लाठियां खायी थीं और जेल गए थे। तब कहीं इंदिरा गांधी की सरकार से मुक्ति मिली थी।(INDI Alliance)
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स्वार्थ सर्वोपरि
विपक्षी गठबंधन की एकता सिर्फ नेताओं में है, वह भी दिखावे के लिए है। कार्यकर्ता आज भी एक-दूसरे को निपटाने में ही मशगूल हैं। चुनाव में टिकट वितरण के दौरान विपक्षी गठबंधन के राज्यस्तरीय नेताओं की कटुता चरम पर होती है। हमने देखा कि विधानसभा चुनावों के दौरान सीट बंटवारे में इन्होंने एक-दूसरे पर क्या-क्या आरोप लगाये थे। कई जगहों पर फ्रेंडली फाइट करते दिखाई देते हैं और हार जाने के बाद बैठकर रुदाली करते हैं। देश ने देखा कि महाराष्ट्र में कैसे उद्धव ठाकरे और शरद पवार का उनके अपनों ने ही बिस्तर गोल कर दिया। अब पश्चिम बंगाल में भी यही हो रहा है। बिहार की हालत किसी से छिपी नहीं है। सबकुछ गंवाकर लालू परिवार अब सरकारी बंगले और व्यक्तिगत सुरक्षा पर कैसे हाय-तौबा कर रहा है। इनकी प्राथमिकता में जनता कहीं है ही नहीं। हाल का उदाहारण मध्य प्रदेश की राज्यसभा सीट को ले सकते हैं। कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन सूचना छिपाने के कारण रद्द हो जाने पर सिर्फ कांग्रेसी ही हो-हल्ला कर रहे हैं। बाकी विपक्ष खामोश है। ऐसे में आगे विपक्षी गठबंधन कौन-सी क्रान्ति कर लेगा, समझा जा सकता है।(INDI Alliance)

