Bihar Assembly Elections: बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण के लिए नामांकन पत्र दाखिल करने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। पहले चरण के नामांकन ने साफ कर दिया है कि महागठबंधन एकजुट नहीं है बल्कि” विरोधाभासों का गठजोड़” बन चुका है। सत्ता की लड़ाई में सीटों का समीकरण ही सब कुछ बन गया है, जबकि “विचारधारा की एकता “का दावा अब खोखला लगने लगा है। बिहार की राजनीति में इंडी गठबंधन के दलों में आई दरार आने वाले चरणों में और गहरी हो सकती है। सीट बंटवारे को लेकर असंतोष, क्षेत्रीय नेताओं की नाराजगी और उम्मीदवारों के चयन में मतभेद ने यह संकेत दे दिया है कि एकजुटता की जो तस्वीर महागठबंधन ने बिहार की जनता के सामने पेश की थी वह भीतर से दरकी की हुई है।(Bihar Assembly Elections)
सीट बंटवारे पर राजद और कांग्रेस में असहमति
बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण की लगभग 94 सीटों पर नामांकन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, लेकिन महागठबंधन के भीतर सीट बंटवारे पर असहमति अभी भी बनी हुई है। राष्ट्रीय जनता दल ने कई सीटों पर कांग्रेस और वाम दलों से परामर्श के बिना उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। कांग्रेस नेतृत्व इस कदम से नाराज है कि उसे कमजोर सीटें दी गई हैं जबकि कुछ पर पुराने कांग्रेसी उम्मीदवारों को किनारे कर नए चेहरों को उतारा गया है। वामपंथी दलों (सीपीआई,सीपीएम, सीपीआई-एमएल) में भी कई सीटों पर अनुचित बंटवारे की शिकायत की है और कहा है कि राष्ट्रीय जनता दल ने वाम दलों के जनाधार वाले इलाकों में अपने प्रत्याशी उतार दिए।(Bihar Assembly Elections)
राजद के भीतर भी खींचतान
तेजस्वी यादव के नेतृत्व शैली को लेकर राष्ट्रीय जनता दल के भीतर भी असंतोष खुलकर सामने आ रहा है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेता टिकट वितरण से असंतुष्ट है और कई ने निर्दलीय उम्मीदवारों के तौर पर मैदान में उतारने का संकेत दिया है। ” परिवारिक छवि” और “युवा बनाम वरिष्ठ” के द्वंद ने लालू प्रसाद यादव की पार्टी में अनिश्चिता बढ़ा दी है। कुछ पुराने यादव नेताओं का कहना है कि राजद अब केवल “यादव मुस्लिम समीकरण” पर भरोसा कर रही है जबकि सामाजिक विस्तार की बातें लालू परिवार के सदस्यों के सिर्फ भाषणों में रह गई है।(Bihar Assembly Elections)
कांग्रेस की रणनीतिक दुविधा
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी दुविधा राहुल गांधी के कदमों से है। बिहार कांग्रेस के कई नेताओं का मानना है कि बिहार चुनाव में राहुल गांधी की कम सक्रियता ने पार्टी को उलझन में डाल दिया है। नेतृत्व परिवर्तन की कमी, स्थानीय स्तर पर संगठन की निष्क्रियता और टिकट वितरण में देरी से कांग्रेस का कर्ता परेशान हैं। बिहार कांग्रेस और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के बीच संवादहीनता ने उलझन और बढ़ा दी है। कई जिलों में कांग्रेस के उम्मीदवारों ने राष्ट्रीय जनता दल प्रत्याशियों के खिलाफ “मूक विद्रोह” शुरू कर दिया है।(Bihar Assembly Elections)
वाम दलों की अलग चाल
वामपंथी दल महागठबंधन में सीमित साझेदारी के साथ रहकर भी अपनी जमीन मजबूत करने की रणनीति अपना रही है पिछले चुनाव में जिन इलाकों में उनका प्रदर्शन बेहतर रहा था, वहां से अब “समानांतर प्रचार” और “स्वतंत्र” एजेंडा लेकर चल रहे हैं ।वामपंथी दल राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस के सियासी नैरेटिव से खुद को अलग स्थापित करना चाहते हैं।(Bihar Assembly Elections)
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इंडी गठबंधन की दरार का सियासी असर
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस अंदरूनी टूट का सीधा फायदा एनडीए को मिल सकता है।महागठबंधन के घटक दल एक दूसरे के खिलाफ “मौन प्रचार” कर रहे हैं। जबकि कई सीटों पर फ्रेंडली फाइट के हालात बन गए हैं ।जो इंडी गठबंधन की एकता के दावे को खोखला बना रहे हैं । अगर यह असंतोष पहले चरण में ही वोटो में झलक गया तो दूसरे चरण के मतदान में महागठबंधन की मुश्किलें और बढ़ेगी।(Bihar Assembly Elections)

