पूर्व डीजीपी प्रवीण दीक्षित ने वामपंथ को बताया लोकतंत्र का दुश्मन, खतरनाक इरादे से किया सचेत

स्वतांत्र्यवीर सावकर राष्ट्रीय स्मारक के अध्यक्ष पूर्व डीजीपी प्रवीण दीक्षित ने कहा कि यह वामपंथियों का बड़ा षड्यंत्र है कि वे अपना असली चेहरा छिपाते हैं और किसानों, मजदूरों, दलितों, अल्पसंख्यकों तथा गरीबों के हित के नाम पर हिंसा का सहारा लेते हैं।

महाराष्ट्र के पूर्व पुलिस महानिदेशक और स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक, मुंबई के अध्यक्ष प्रवीण दीक्षित ने नक्सलवादियों और वामपंथियों को लेकर महत्वपूर्ण बात कही है। उन्होंने उनके खतरनाक इरादे से देश के लोगों को अवगत कराया है। पूर्व डीजीपी ने कहा है कि लोगों को गलत, कपटपूर्ण इतिहास बताकर और झूठी जानकारी फैलाकर समाज में हिंसा के बीज बोने वाली वामपंथी प्रवृत्तियों के खतरनाक चेहरे को समझना होगा। राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रवीण दीक्षित ने जोर देकर कहा कि चीन की नीतियों का समर्थन कर लोकतांत्रिक भारत की व्यवस्था को बर्बाद करना ही वामपंथियों का उद्देश्य है। प्रवीण दीक्षित पुणे में भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष माधव भंडारी की पुस्तक ‘द रियल फेस ऑफ द लेफ्ट’ के विमोचन समारोह में बोल रहे थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता विवेक विचार मंच के अध्यक्ष पूर्व सांसद प्रदीप रावत ने की।

नक्सलवाद वामपंथियों का हिंसक चेहरा 
पूर्व डीजीपी ने कहा कि यह वामपंथियों का बड़ा षड्यंत्र है कि वे अपना असली चेहरा छिपाते हैं और किसानों, मजदूरों, दलितों, अल्पसंख्यकों तथा गरीबों के हित के नाम पर हिंसा का सहारा लेते हैं। वे यह दिखावा करते हैं कि वे उनके के वास्तविक हितैषी हैं। प्रवीण दीक्षित ने कहा कि वामपंथियों ने बंगाल, त्रिपुरा और केरल को प्रायोगिक स्कूलों के रूप में इस्तेमाल किया। नक्सलवाद वामपंथ का अलगाववादी- कट्टरपंथी चेहरा है। विश्वासघात उनका स्वभाव है। प्रवीण दीक्षित ने पुस्तक की प्रशंसा करते हुए कहा कि लेखक ने वामपंथियों के भ्रष्टाचार, दिखावे के विरोध, बौद्धिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार की वास्तविकता पर प्रकाश डाला है।

ये है वामपंथियों का नापाक इरादा
भारतीय वामपंथ का उद्देश्य लोकतांत्रिक रूप से संचालित भारत को नष्ट करना और माओवाद के नाम पर सत्ता तथा शक्ति पर कब्जा करना है। हालांकि चीन के शासकों ने उसे खुद ही खारिज कर दिया है। दीक्षित ने कहा कि लेखक ने सभी को यह समझाने की कोशिश की है कि जनता को इसे समझना और उससे सावधान रहना जरूरी है।

ये है वामपंथ का असली चेहरा
दीक्षीत ने कहा कि लेखक का कहना है कि नक्सली अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत विरोधी रुख अपनाते हैं, चीन का साथ देकर भारत की आलोचना करते हैं, खुद को कम्युनिस्ट कहने के बजाय वामपंथी कहते हैं, कांग्रेस में शामिल होकर अपना असली चेहरा छिपा कर रखते हैं और कांग्रेस भी उनका राजनैतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करती है। यही वामपंथ का असली चेहरा है।

नक्सलियों के निशाने पर दलित, आदिवासी महिलाएं 
स्वातंत्र्यवीर सावरकर स्मारक के अध्यक्ष ने कहा कि 18वीं शताब्दी में यूरोप में औद्योगिक क्रांति हुई और मशीनों की मदद से चीजें बनानी शुरू हुईं। इसके साथ ही, मालिक और श्रमिक नाम के दो वर्ग बनाए गए। मार्क्स ने दर्शन दिया कि मालिक हमेशा श्रमिकों का शोषण करते हैं, जमींदार भूमिहीन मजदूरों का शोषण करते हैं, अमीर गरीबों पर अत्याचार करते हैं। दरअसल, इंग्लैंड में मार्क्स का ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ा, लेकिन रूस में लेनिन ने उनसे प्रेरणा ली और वहां लोकतंत्र के जरिए सत्ता में आए, लोकतंत्र को समाप्त किया और कम्युनिस्टों की सत्ता स्थापित की। लेनिन के बाद, कम्युनिस्टों ने स्टालिन से गोर्बाचेव तक शासन करना जारी रखा। इसी बीच माओ ने चीन में सत्ता हथिया ली और वहां भी कम्युनिस्ट शासन की अपनी शैली शुरू कर दी। स्वतंत्रता पूर्व युग में कई भारतीय युवा कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ने गए और कम्युनिस्ट बनकर वापस आ गए। उन्होंने प्रशासनिक सेवा में काम करते हुए जनविरोधी काम किया। हालांकि बाहरी लोगों को बस्तर के जंगल में प्रवेश करने की मनाही थी, लेकिन मिशनरियों पर कोई रोक नहीं थी। दलित और आदिवासी महिलाएं नक्सलियों के निशाने पर हैं। पूर्व डीजीपी ने कहा कि भंडारी ने लेखन के उद्देश्य को यह समझाया है कि वामपंथ की नीति हिंसक साधनों के माध्यम से सत्ता परिवर्तन करना है।

समाज में धार्मिक कलह फैलाना वामपंथियों का काम 
कई उदाहरण देकर, लेखक आश्वस्त करता है कि भ्रष्टाचार वामपंथ का लोकाचार था। बेईमानी न केवल राजनीति में बल्कि अकादमिक, ऐतिहासिक और मीडिया क्षेत्रों में भी वामपंथियों की विशेषता है। वामपंथी गलत इतिहास बताकर देश और समाज में धार्मिक संघर्ष फैलाते हैं। दीक्षित ने जोर देकर कहा कि न केवल आम पाठक बल्कि सभी राजनेता, कॉलेज के छात्र इस पुस्तक को ध्यान से पढ़ें।

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