Bihar Elections 2025: बिहार चुनाव में फिर मुद्दा बना ‘जंगलराज’, जानें लालू प्रसाद यादव की हिस्ट्री

सामाजिक न्याय के नारे के बीच 1990 से 2005 तक राज्य में अपराध, अपहरण और गुंडागर्दी चरम पर पहुंच गई, जिस कारण विपक्ष ने इस दौर को "जंगल राज" का नाम दिया। तीन दशक बाद भी यह शब्द लालू परिवार और राजद का पीछा नहीं छोड़ रहा है।

215

– नरेश वत्स

बिहार (Bihar) की राजनीति (Politics) में “जंगल राज” (Jungle Raj) शब्द किसी पार्टी या नेता से ज्यादा एक पूरे दौर का प्रतीक बन चुका है… ‌यह शब्द पहली बार 1990 के दशक में उस समय उभरा जब लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) बिहार की राजनीति के केंद्र में थे। लेकिन आज तीन दशक बाद भी यह शब्द उनके परिवार और राष्ट्रीय जनता दल का पीछा नहीं छोड़ रहा। सवाल आखिर ऐसा क्यों?

“जंगल राज” उत्पत्ति
1990 में जब लालू प्रसाद यादव पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने सामाजिक न्याय का नारा बुलंद किया “भूराबाल साफ करो” इस नारे का मतलब था कि भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला को सत्ता से दूर करो। यह नारा पिछड़े और दलित तबके को सशक्त करने का प्रतीक बना लेकिन शासन व्यवस्था पर इसका गहरा असर पड़ा। 1990 से लेकर 2005 के बीच बिहार में अपराध, अपहरण और गुंडागर्दी की घटनाएं इतनी बढ़ गई कि भाजपा समेत सभी विपक्षी दलों ने बिहार को “जंगल राज” कहना शुरू कर दिया।

यह भी पढ़ें – Maharashtra: राजभवन में पीएम मोदी और स्टार्मर की मुलाकात, अजीत डोभाल भी मौजूद; क्या है वजह?

अपराध और शासन की छवि
उसे दौर में व्यापारियों के अपहरण, प्रशासनिक, भ्रष्टाचार और पुलिस व्यवस्था के पतन ने आम जनता को भयभीत किया हालांकि लालू प्रसाद यादव ने खुद को ‘गरीबों का मसीहा’ बताया। लेकिन धरातल पर लालू प्रसाद यादव का शासन “अराजक शासन” के रूप में जाने जाने लगा। वर्ष 2005 में जब नीतीश कुमार ने सत्ता संभाली तो उन्होंने “सुशासन “शब्द को इस “जंगलराज” के जवाब में रूप में पेश किया।

प्रतीकवाद की जकड़
समय के साथ बिहार के हालात बदले, लेकिन लालू प्रसाद यादव के परिवार से “जंगलराज” का टैग फेवीकोल की तरह चिपक गया। ‌आज भी जब तेजस्वी यादव या मीसा भारती कोई राजनीतिक कदम उठाते हैं तो विरोधी पार्टियों तुरंत वही शब्द दोहराती है “राजद लौटा, तो जंगलराज लौटेगा”। ‌बिहार की राजनीति में “जंगलराज” एक राजनीतिक हथियार बन चुका है।

नई पीढ़ी और पुरानी छवि की जंग
तेजस्वी यादव जो खुद को नई सोच का नेता कहते हैं। बिहार में नौकरियां और युवाओं के मुद्दे पर राजनीति करने का दावा करते है। लेकिन प्रत्येक चुनाव में “जंगलराज” की पुरानी छवि उनके आगे दीवार बन जाती है। उनके लिए चुनौती सिर्फ भाजपा या नीतीश कुमार नहीं बल्कि अपने पिता की विरासत और उसके साथ जुड़ी छाया भी है।

क्यों नहीं मिट्टी का रहा जंगल राज का दाग?
बिहार में नया जनादेश लाने के लिए एनडीए और महागठबंधन में कड़ा मुकाबला है। प्रशांत किशोर की नई पार्टी जन सुराज भी बिहार में बदलाव की मांग कर रही है। ‌लेकिन बिहार की जनता में 1990 के दशक की घटनाएं जन चेतना में दर्ज है। ‌भले ही तेजस्वी यादव रोजगार देने का वादा कर रहे हैं। लेकिन पुराना डर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

लालू प्रसाद यादव ने बिहार को सामाजिक न्याय की राजनीति दी लेकिन इस दौर ने उन्हें” जंगलराज “का प्रतीक भी बना दिया आज उनका परिवार इस दाग को मिटाने और सामाजिक न्याय की नई परिभाषा करने की कोशिश कर रहा है।लेकिन राजनीति में प्रतीकवाद की उम्र लंबी होती है और “जंगलराज” शब्द शायद अभी भी लालू प्रसाद यादव की राजनीति की परछाई बना रहेगा। (Bihar Elections 2025)

देखें यह वीडियो – 

Join Our WhatsApp Community
Get The Latest News!
Don’t miss our top stories and need-to-know news everyday in your inbox.