Hamid Ansari’s Controversial Statement: भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी द्वारा ‘इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर’ में दिए गए बयान पर तीखा विवाद खड़ा हो गया है। उन्होंने कहा कि भारत को साम्यवाद से नहीं, बल्कि हिंदू विचारधारा वाली दक्षिणपंथी विचारधारा से संकट है। इस वक्तव्य पर कड़ा प्रहार करते हुए विश्लेषकों का कहना है कि यह ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ वाली कहावत को चरितार्थ करता है। भारत का इतिहास साक्षी है कि देश का विभाजन किस मानसिकता के कारण हुआ। यदि हिंदू समाज धर्मांध होता, तो न केवल भारत का विभाजन रुक जाता, बल्कि हामिद अंसारी कभी देश के दूसरे सर्वोच्च संवैधानिक पद तक नहीं पहुंच पाते।
पद छोड़ते ही बदला सुर: 10 साल सत्ता सुख भोगने के बाद असुरक्षा का राग
लगातार दस वर्षों तक (2007 से 2017) देश के उपराष्ट्रपति पद पर आसीन रहकर सत्ता के समस्त सुख, सम्मान और सुरक्षा का उपभोग करने वाले हामिद अंसारी को पद से हटते ही भारत में ‘हिंदू धर्मांधता’ नज़र आने लगी। जब तक वे संवैधानिक पद की गरिमा और सुविधाओं का आनंद लेते रहे, तब तक उन्हें देश की व्यवस्था और बहुसंख्यक समाज में कोई दोष नहीं दिखा। लेकिन पदमुक्त होते ही अंतरराष्ट्रीय व राष्ट्रीय मंचों से बहुसंख्यक समाज और उसकी मूल विचारधारा को निशाना बनाना उनकी निष्ठा और मंशा पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करता है।
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बहुसंख्यक समाज की उदारता पर हमला: पाकिस्तान-बांग्लादेश के हालात से बेखबर?
हामिद अंसारी का यह आरोप कि भारत को हिंदू विचारधारा से खतरा है, पूरी तरह आधारहीन और ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत है। भारत का लोकतांत्रिक और सहिष्णु स्वरूप यहाँ की बहुसंख्यक आबादी की उदारता के कारण ही अक्षुण्ण है। यदि भारत में हिंदू समाज धर्मांध होता, तो आज यहां अल्पसंख्यकों की स्थिति वैसी ही होती जैसी पड़ोसी देश पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं की है-जहां वे लगातार अत्याचार, उत्पीड़न और जबरन धर्मांतरण का शिकार होकर अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।
आपराधिक और पारिवारिक संबंधों की छाया: बाहुबली कुनबे से जुड़ाव पर उठते सवाल
हामिद अंसारी की पारिवारिक पृष्ठभूमि को लेकर भी सार्वजनिक जीवन में अक्सर चर्चाएं होती रही हैं। वे और पूर्वांचल के चर्चित बाहुबली नेता रहे मुख्तार अंसारी एक ही विस्तारित परिवार (गाज़ीपुर के अंसारी परिवार) से ताल्लुक रखते हैं। जहां एक तरफ उनके परिवार का कूटनीतिक इतिहास रहा है, वहीं दूसरी तरफ मुख्तार अंसारी जैसे आपराधिक छवि वाले बाहुबली का नाम भी उसी कुनबे से जुड़ा रहा। सार्वजनिक जीवन में सर्वोच्च पदों पर रहे व्यक्तियों से राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की अपेक्षा की जाती है, न कि पारिवारिक या राजनीतिक तुष्टिकरण के तहत देश की मूल विचारधारा पर लांछन लगाने की।
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कूटनीतिक अतीत पर उठे सवाल: देश की छवि धूमिल करने की कोशिश
अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों से लेकर पदमुक्त होने के बाद तक हामिद अंसारी ने ऐसे कई बयान दिए हैं, जिनसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि प्रभावित हुई। ईरान में भारत के राजदूत रहने के दौरान उनके निर्णयों पर ‘रॉ’ (RAW) के पूर्व अधिकारियों द्वारा उठाए गए सवाल हों, या फिर देश के भीतर बहुसंख्यक समाज को कटघरे में खड़ा करने की राजनीति-यह सब एक विशेष वर्ग को साधने और राष्ट्र की वैश्विक साख को ठेस पहुँचाने की सोची-समझी कोशिश प्रतीत होती है।
भारत के लोकतंत्र का अपमान: कृतघ्नता की राजनीति पर कड़ा संदेश
देश के सर्वोच्च पदों पर रहे व्यक्तियों से निष्पक्षता और राष्ट्रनिष्ठा की अपेक्षा की जाती है। भारत ने हामिद अंसारी को देश का दूसरा सर्वोच्च संवैधानिक पद देकर जो सम्मान दिया, उसके बदले में देश के बहुसंख्यक समाज को ‘संकट’ बताना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और कृतघ्नता की पराकाष्ठा है। भारत का लोकतंत्र किसी एक वर्ग की मेहरबानी नहीं, बल्कि हिंदू दर्शन की सहिष्णुता और उदारता का परिणाम है, जिसे ऐसे नकारात्मक और विभाजनकारी बयानों से धूमिल नहीं किया जा सकता।

