CJI: सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि यदि शुरुआत में ही व्यक्ति की वास्तविक जरूरत जान ली जाए तो विवाद ही उत्पन्न नहीं होता। कई बार समाधान अधिकार तय करने में नहीं, बल्कि वास्तविक आवश्यकता समझने में होता है। कानून कभी यह नहीं कहता कि हर विवाद का अंत कोर्ट में ही हो। कानून का उद्देश्य यह तय करना है कि हर नागरिक को सस्ता, सम्मानजनक और सुलभ न्याय मिले। सीजेआई ने यह विचार जयपुर में पीस मिडिएशन एंड रूल ऑफ लॉ विषय पर आयोजित तीन दिवसीय कांफ्रेंस के दूसरे दिन आयोजित सेशन में रखे।(CJI)
सीजेआई ने एक कहानी सुनाते हुए कहा कि दो बहनें एक ही संतरे के लिए झगड़ा कर रही थी। इस दौरान पता चला कि एक बहन को सिर्फ छिलका चाहिए था और दूसरी को उसका रस। मुकदमा यह तय करता है कि संतरे का मालिक कौन है, जबकि मिडिएशन यह जानने का प्रयास करती है कि किसे क्या चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय न्याय संस्कृति हमेशा टकराव से पहले संवाद और समझौते को महत्व देती है। महात्मा गांधी का उदाहरण देते हुए सीजेआई ने कहा कि उनका संतोषजनक क्षण वह होता था, जब वे कोर्ट के बाहर पक्षकारों के बीच समझौता कराते थे।(CJI)
इस मौके पर सुप्रीम कोर्ट के जज विजय बिश्नोई ने कहा कि मध्यस्थता को भले ही हाल ही के सालों में औपचारिक रूप से मान्यता मिली हो, लेकिन यह भारत के गांवों और पंचायतों में सदियों से मौजूद है। हर मुकदमा केवल एक कानूनी विवाद नहीं होता, बल्कि उसके पीछे ऐसे लोग होते हैं, जो न्याय, सम्मान और मानसिक शांति की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं। कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी ने कहा कि जब पहली बार प्रदेश में मिडिएशन को शुरू किया गया था तो इसे व्यावहारिक नहीं बताया गया था, लेकिन समय बीतने के बाद अब यह कई बडे विवाद सुलझाने का जरिया बन गया है।(CJI)
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वहीं एक्टिंग सीजे एसपी शर्मा ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि पहली मिडिएटर मां होती है, जो परिवार के दो बच्चों के बीच के झगडे को सुलझाती है, जब वह फेल होती है तो दूसरे मिडिएटर के तौर पर पिता सामने आते हैं। कांफ्रेंस को उपमुख्यमंत्री प्रेमचंद बैरवा और महाधिवक्ता राजेन्द्र प्रसाद ने भी संबोधित किया।(CJI)
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