Department of Telecommunications: जानिये, क्या है संचार साथी ऐप और सरकार सभी मोबाइल फोन में इंस्टॉल करना क्यों करना चाहती है अनिवार्य?

केंद्र सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकम्युनिकेशन (DOT) ने स्मार्टफोन निर्माता को निर्देश दिया है कि वह मार्च 2026 से बेचे जाने वाले नए मोबाइल फोन में संचार साथी ऐप को फ्री इंस्टॉल करके रखें। यानी जब आप नया फोन लेते हैं तो सेटअप के दौरान ऐप पहले से मौजूद होगा।

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Department of Telecommunications: जानिये, क्या है संचार साथी ऐप और सरकार सभी मोबाइल फोन में इंस्टॉल करना क्यों करना चाहती है अनिवार्य?
नरेश वत्स Department of Telecommunications: केंद्र सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकम्युनिकेशन (DOT) ने स्मार्टफोन निर्माता को निर्देश दिया है कि

नरेश वत्स

Department of Telecommunications: केंद्र सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकम्युनिकेशन (DOT) ने स्मार्टफोन निर्माता को निर्देश दिया है कि वह मार्च 2026 से बेचे जाने वाले नए मोबाइल फोन में संचार साथी ऐप को फ्री इंस्टॉल करके रखें। यानी जब आप नया फोन लेते हैं तो सेटअप के दौरान ऐप पहले से मौजूद होगा। इस ऐप का उद्देश्य है फोन के IMEI (डिवाइस की यूनिक पहचान) चेक करना, यह देखने के लिए फोन असली है या नकली,ब्लैकलिस्टेड तो नहीं; चोरी या खोए हुए फोन की रिपोर्ट करना; फर्जी कॉल, मैसेज या धोखाधड़ी वाले नंबरों, कनेक्शन की शिकायत दर्ज करना और मोबाइल कनेक्शन की जांच करना कि आपके नाम पर कितने मोबाइल नंबर रजिस्टर्ड है । सरकार का कहना है कि यह कदम बढ़ते साइबर फ्रॉड, फर्जी डुप्लीकेट, आईएमईआई IMEI वाले फोन, चोरी से बेचे जाने वाली मोबाइल्स और फ्रॉड कॉल, मैसेज से निपटने के लिए है। इस प्रकार सरकार ,इसे साइबर सुरक्षा और उपभोक्ता सुरक्षा उपाय बताती है।(Department of Telecommunications)

निजता पर हमलाः विपक्ष
हालांकि सरकार इसका उद्देश्य सुरक्षा दिखा रही है लेकिन, इस फैसले पर सवाल खड़े जा रहे है । पहला नियंत्रण और अनचाही निगरानी करना इसके अनिवार्य और नॉन रिमूवेबल हटाया न जा सकने वाला डिजिटल राइट्स । डिजिटल एक्सपर्ट्स का कहना है कि जब आप ऐप को अनचाही रूप से इंस्टॉल और हटा भी ना सके तो उपयोगकर्ता की आजादी सीमित हो जाती है।(Department of Telecommunications)

विपक्ष का कहना है कि यह आदेश संविधान में दी गई स्वतंत्रता और निष्ठा के अधिकार का उल्लंघन है यानी सरकार हर नागरिक की हर बातचीत हर फोन कॉल हर मैसेज देख सकती है। सहमति और उपयोगकर्ता की आजादी होना दूसरा तर्क यह दिया जा रहा है कि उपयोगकर्ता की आजादी सीमित हो जाती है। एक निजी फोन अब आपकी निजी नहीं रह जाता
डेटा सुरक्षा और पारदर्शिता की कमी का सवाल उठ रहा है कि ऐप को अनिवार्य करने से सरकार या इसके पीछे कौन सा डेटा कॉल, मैसेज , फोन गतिविधियां ,एसआईएम डेटा आदि पर क्या उन पर पर्याप्त पारदर्शिता और नियंत्रण है ?डेटा रिटेंशन कितनी देर तक रखे जाएंगे और उपयोग की शर्तें स्पष्ट नहीं दिख रही है जो दुरुपयोग के रास्ते खोलती हैं। भविष्य में सरकार इसका दायरा बढ़ा सकती है।

आलोचक यह भी कहते हैं कि एक बार सरकार को ही अधिकार मिल गया कि हर फोन में अपना ऐप पहले से इंस्टॉल कर दे तो भविष्य में इस तरह से और ऐप मॉनिटरिंग टूल्स जुड़ सकते हैं जिससे निजी संवाद और डिजिटल आजादी पर खतरा बढ़ जाएगा।

कानूनी और संवैधानिक जटिलताएं
आलोचकों का कहना है कि इस तरह का आदेश बिना व्यापक सार्वजनिक चर्चा सहमति या संतुष्टि के संवैधानिक अधिकारों जैसे डिजिटल व्यक्तिगत स्वतंत्रता के तहत चुनौती के योग्य हो सकता है। ‌ इस तरह सिर्फ सुरक्षा का तर्क देकर ऐप को हर फोन में अनिवार्य करना इसे निजता पर हमला बना देता है क्योंकि स्मार्टफोन आज हमारे जीवन का निजी सबसे घनिष्ठ हिस्सा है।

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क्या यह सुरक्षा जरूरत है या दखल
इस विवाद में एक बात साफ है कि निश्चित रूप से भारत में फोन चोरी,फर्जी आईएमईआई फ्रॉड कॉल, स्कैम मैसेज आदि की समस्या है ऐसे में एक साइबर सुरक्षा ऐप उपयोगी हो सकता है ।यदि उपयोगकर्ता की सहमति और परिदृश्यता के साथ परंतु जब वही ऐप हर फोन में अनचाही रूप से हटाए बिना बैकग्राउंड में काम करने लगे तब यह सुरक्षा से ज्यादा नियंत्रण जैसा दिखने लगता है।

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