उत्तराखंड : ‘हमने जीवित रहने की आस छोड़ दी थी, लेकिन तभी…’

चमोली में दो एनटीपीसी की दो सुरंगें हैं। जिनमें से एक के कर्मियों को सुरक्षित निकाल लिया गया है। जबकि दूसरी सुरंग में अब भी अंदर पहुंचा नहीं जा सका है। इस बीच मुख्यमंत्री त्रिवेंद्रसिंह रावत घटनास्थल के लिए रवाना हो गए हैं। इस घटना में 202 लोग अब भी लापता हैं। जिनमें से अधिकांश कंपनी के कर्मचारी हैं।

चमोली के एनटीपीसी की एक सुरंग से 12 कर्मचारियों को निकाल लिया गया है लेकिन दूसरी सुरंग में अभी भी 38 लोगों के फंसे होने की आशंका है। दूसरी सुरंग में आईटीबीपी के जवान 100 मीटर तक ही अंदर पहुंच पाए थे। उसके अंदर पूरा कीचड़ है जिसे मशीनों से निकालने का कार्य तेज गति से चल रहा है।

एक कर्मचारी ने बताया, बाहर लोग चिल्ला रहे थे। हमने भी बाहर जोर-जोर से चिल्लाने की आवाजें महसूस कीं लेकिन हम सुरंग से बाहर निकल पाते उसके पहले ही पानी, कीचड़ की ऐसी लहर आई कि हमारी सुरंग में कीचड़ ही कीचड़ भर गया।

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इसी प्रकार दूसरे कर्मचारी ने बताया कि, हम अपने जीवित रहने की आस छोड़ चुके थे। सुरंग में जिंदगी बचाने की कोशिश में सभी लगे हुए थे। इस बीच हमें एक किरण दिखी हमारे एक साथी के पास मोबाइल था जिसमें नेटवर्क था। उससे हमने कंपनी के प्रबंधक से संपर्क किया गया और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के जवानों ने घंटों की मेहनत करके हमें बाहर निकाला। लाल बहादुर नामक यह कर्मी नेशनल थर्मल पॉवर कॉर्पोरेशन (एनटीपीसी) के तपोवन सुरंग में था जब अलकनंदा ग्लेशियर टूटकर गिरा और चंद मिनटों में पानी, कीचड़ के सैलाब ने पूरे पॉवर प्लांट को रौंद दिया। इस घटना के बाद 7 घंटे तक 12 कर्मचारी सुरंग में फंसे रहे।

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नेपाल के रहनेवाले बसंत बताते हैं कि, जिस समय यह घटना हुई हम 300 पुट गहरी सुरंग में थे। सुरंग में फंसे चमोली के धाक गांव के एक मजदूर ने बताया कि सुरंग में कीचड़ भरने के बाद उन्होंने सिर्फ एक ही काम किया सभी लोग सुरंग की ऊपरी हिस्से में चढ़ गए।

इन कर्मचारियों के वहां से भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के बेस कैंप अस्पताल में ले जाया गया। आईटीबीपी की बटालियन -1 की बेस कैंप जोशीमठ में है।

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