-विजय सिंगल
Bhagavad Geeta: भगवद्गीता का दर्शन कर्म को पूर्णरूपेण त्यागने की बजाय अपने निर्धारित कर्तव्यको अनवरत निभाने का दर्शन है। गीता कर्म के त्याग (संन्यास) का समर्थन नहीं करती। इसके बजाय, यह व्यक्ति को अपना कर्तव्य ईमानदारी से निभाने और अपने कर्मों के फलों की लालसा का त्याग करने के लिए प्रेरित करती है। त्याग के इन दो पहलुओं , कर्म त्याग अर्थात “ संन्यास ” और कर्मफल त्याग अर्थात त्याग”, की प्रकृति और उनके बीच के अंतर को श्लोक 18.1 से 18.12 तक विस्तार से बताया गया है। (Bhagavad Geeta)
यहाँ विद्वान और ज्ञानी ऋषियों के विचारों के आधार पर संस्कृत शब्द ‘संन्यास’ और ‘त्याग’ को समझाया गया है। ये ज्ञानीजन संन्यास का अर्थ सभी लालसा- प्रेरित कर्मों को छोड़ना मानते हैं। उनके अनुसार, संन्यासी को धन तथा भौतिक शक्तियां आदि पाने के लिए किए जाने वाले सभी कामों को छोड़ देना चाहिए। उसे केवल उन्हीं कामों में शामिल होना चाहिए जो शरीर को बनाए रखने के लिए अत्यावश्यक हैं। दूसरी ओर, त्याग का अर्थ सभी कर्मों के फल को छोड़ना बताया गया है। त्यागी सभी तरह के काम करता है, लेकिन कर्ता होने के भाव का त्याग कर देता है। वह अपने कर्मों के फल का आनंद लेने की लालसा छोड़ देता है। (Bhagavad Geeta)
हिंदू विचारधारा के अलग-अलग मतों के आधार पर त्याग के अलग-अलग पहलुओं को भी इन श्लोकों में समझाया गया है। कर्म और उनके त्याग के बारे में अलग-अलग विचारधाराओं की अलग-अलग राय है। कुछ विचारधाराएं कहती हैं कि सभी कर्म मूल रूप से बुरे होते हैं, इसलिए उन्हें छोड़ देना चाहिए। वहीं कुछ अन्य विचारधाराएं मानती हैं कि यज्ञ (निस्वार्थ भाव से काम करना), दान (दान-पुण्य के काम) और तप (आत्म-अनुशासन) जैसे कामों को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। (Bhagavad Geeta)
इन अलग-अलग प्रतीत होने वाली विचारधाराओं पर विचार करने के बाद , श्रीकृष्ण इस स्पष्ट निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि यज्ञ, दान और तप आदि पर आधारित कर्मों को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। भले ही कोई व्यक्ति दूसरे कामों को छोड़ दे, लेकिन यज्ञ, दान और तप के काम नहीं छोड़ने चाहिए। ये काम परमेश्वर की सेवा की भावना से किए जाने चाहिए। ऐसे नेक काम इंसान को आध्यात्मिक स्तर पर ऊपर उठाते हैं। श्रीकृष्ण ने यह भी कहा है कि ऐसे अच्छे काम बुद्धिमान लोगों को भी शुद्ध करते हैं। दूसरे शब्दों में, ये काम व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास और उन्नति में मदद करते हैं। आध्यात्मिक पूर्णता को प्राप्त कर लेने के उपरांत भी व्यक्ति को अपने अनिवार्य कर्तव्य नहीं छोड़ने चाहिए। मुक्ति पाने के बाद भी मुक्त आत्मा को सक्रिय सेवा में लगे रहना चाहिए। (Bhagavad Geeta)
श्रीकृष्ण ने भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के संदर्भ में सच्चे त्याग का अर्थ भी समझाया है। कुछ अज्ञानी विवेकहीन लोग भ्रमवश अपने अनिवार्य कर्मों (वे कर्तव्य जिनका पालन करना आवश्यक है) का त्याग कर देते हैं। त्याग के नाम पर किया गया कर्मों का ऐसा त्याग, अज्ञान अर्थात तमस के गुण के प्रभाव में किया गया तामसिक त्याग माना गया है। श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है कि इस प्रकार का त्याग निश्चित रूप से उचित नहीं है। कुछ अन्य लोग आवश्यक कर्मों को मूलतः कष्टदायक मानकर या शारीरिक असुविधा के भय से छोड़ देते हैं। (Bhagavad Geeta)
कठिन परिश्रम से बचने या असफलता के डर से, ऐसे लोग आध्यात्मिक आकांक्षा का बहाना बनाकर पलायनवादी रवैया अपनाते हैं; और स्वयं, अपने परिवार, अपने व्यवसाय तथा व्यापक समाज के प्रति अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाते हैं। इस प्रकार के त्याग को ‘आसक्ति के गुण’ अर्थात रजस गुण के प्रभाव में किया गया राजसिक त्याग कहा जाता है। श्रीकृष्ण ने इस प्रकार के त्याग को भी अस्वीकार किया है और घोषित किया है कि ऐसा त्याग कभी भी लाभकारी या उन्नतिशील नहीं होता। इन पाखंडपूर्ण त्यागों के विपरीत , श्रीकृष्ण ने सलाह दी है कि व्यक्ति को अपने अनिवार्य कर्तव्यों का पालन केवल इसलिए करना चाहिए क्योंकि वे आवश्यक हैं ; साथ ही, कर्मों के प्रति सभी आसक्तियों का त्याग करना चाहिए और बदले में मिलने वाले फल की अपेक्षाओं को छोड़ देना चाहिए। (Bhagavad Geeta)
ऐसे त्याग को ‘निर्मलता या संतुलन के गुण’ के प्रभाव में किया गया सात्विक त्याग कहा गया है और इसे उचित माना गया है। जो लोग सात्विक त्याग की स्थिति में होते हैं, उन्हें कार्य की प्रकृति के बारे में कोई संदेह नहीं होता। वे जानते हैं कि दी गई परिस्थितियों में क्या करना है और क्या नहीं करना है। वे न तो किसी अप्रिय कार्य से बचते हैं और न ही किसी कार्य को केवल इसलिए चुनते हैं कि वह उन्हें पसंद है। वे बस अपना कर्तव्य निभाते हैं —न तो स्थितियाँ अनुकूल होने पर अत्यधिक उत्साहित होते हैं और न ही प्रतिकूल होने पर निराश होते हैं। (Bhagavad Geeta)
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श्रीकृष्ण ने फिर से कहा है कि किसी भी जीव के लिए काम से विरत रहना असंभव है। हर किसी को अपनी जीवन-स्थिति के अनुसार कुछ न कुछ काम करना ही पड़ता है। यही उसका अनिवार्य कर्तव्य है। अनिवार्य कर्तव्य का कभी भी त्याग नहीं किया जा सकता। लेकिन जो व्यक्ति अपने कर्मों के फल की लालसा का त्याग कर देता है, उसे ही त्यागी कहा जाता है। (Bhagavad Geeta)
जो लोग व्यक्तिगत फल की इच्छा रखते हैं, उन्हें कर्मों के तीन तरह के फल मिलते हैं – सुखद, दुखद और मिश्रित। लेकिन जब कोई स्वार्थपूर्ण इच्छा को त्याग देता है और केवल ईश्वर की सेवा के भाव से काम करता है, तो उसे न तो इस लोक में और न ही परलोक में ऐसे फल मिलते हैं। (Bhagavad Geeta)
संन्यास और त्याग के पूरे स्वरूप को संक्षेप में कहें तो, संन्यासी वह है जो आध्यात्मिक लक्ष्यों को पाने के लिए पारिवारिक जीवन और सामाजिक उत्तरदायित्वों से विरत हो जाता है। दूसरी ओर, त्यागी वह है जो दुनिया के कामों में सक्रिय रूप से शामिल तो रहता है, लेकिन बिना किसी स्वार्थ के। इस तरह, आध्यात्मिक उन्नति बाहरी काम करने या न करने पर निर्भर नहीं करती। यह एक निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाने और अहंकार का अंदर से त्याग करने की प्रक्रिया है। अज्ञानी और आडंबरपूर्ण व्यक्तियों की अकर्मण्यता से उत्पन्न कृत्रिम शांति के विपरीत, त्यागी व्यक्तियों की अविचलता का कारण उनका निरपेक्ष भाव होता है जिस से भारी भरकम सांसारिक उत्तरदायित्वों के बावजूद वे अपनी आंतरिक शांति को बनाए रखते हैं। (Bhagavad Geeta)
निष्कर्ष के तौर पर, गीता कर्मों के पूरी तरह त्याग की शिक्षा नहीं देती। यह केवल बिना किसी लालसा के सभी कर्म करने की सलाह देती है। जो व्यक्ति अपने सभी कामों और उनके फलों को परमेश्वर को समर्पित कर देता है, वही सच्चा त्यागी है। (Bhagavad Geeta)
यह भी देखें
https://youtu.be/avc_bnFQGvs?si=fzYXV8n3bBeOZQIQ
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