दीदी का विजयोत्सव! निर्दयी ‘ममता’ शर्मसार ‘मानवता’

पश्चिम बंगाल हिंसा की आग में जल रहा है। राज्यपाल ने राज्य के मुख्य सचिव समेत प्रमुख अधिकारियों को तलब किया था। सायंकाल तक हिंसा के नाच से केंद्रीय गृह मंत्रालय हरकत में आ गया। उसने बंगाल के मुख्य सचिव से हिंसा की घटनाओं पर रिपोर्ट मांगी है।

अब प्रतीत होने लगा है कि बंगाल में प्रशासन विलुप्तप्राय हो गया है। चुनाव प्रचार के बीच मचा आतंक अब मतगणना के पश्चात जीत का जंगलराज दर्शा रहा है। इसे राजनीतिक दलों के प्रति निष्ठा कही जाए या पागलपन, जिसके मद में यहां पीट-पीटकर महिला, पुरुषों को मौत के घाट उतारा जा रहा है। यह निंदनीय ही नहीं, बल्कि अंधेरगर्दी का ऐसा राज है जिस पर कानून-व्यवस्था के रक्षक मूक दर्शक बने हुए हैं। जनता कह रही है कि यदि यही बंगाल की दीदी का वियजोत्सव है तो इससे अच्छा होगा कि वहां राष्ट्रपति शासन रहे। मारे जा रहे नागरिक जन सामान्य हैं और मारनेवाले भी उसी समाज का हिस्सा, लेकिन रिसते रक्त और टीसते दर्द को समझनेवाला कोई नहीं है क्योंकि, आतंक प्रबल है और मातम बिलख रहा है।

हिंसा का लंबा इतिहास
पश्चिम बंगाल में हिंसा का लंबा इतिहास रहा है। देश के विभाजन में शराणार्थियों की समस्या, विस्थापन उसे विरासत में मिली है। पूर्वी पाकिस्तान अपनी ही सेना के अत्याचार से पीड़ित था। इसके छींटों से बंगाल भी बचा नहीं रह पाया क्योंकि उसे शरणार्थियों का बोझ झेलना पड़ रहा था। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का शासन था। 1950 में कूचबिहार और 1955 में चंदन नगर का भारत में विलय हुआ। इस बीच 1971 में भारत ने पाकिस्तान को हराकर पूर्वी पाकिस्तान को बांग्लादेश के रूप में एक देश की मान्यता दिला दी। सत्तासीन शासन कर रहे थे और जनता समस्याओं से जूझ रही थी। अंदर ही अंदर वामपंथी आग भी लग चुकी थी।

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यहीं से शुरू हुआ नक्सलवाद
1967 में नक्सलबाड़ी से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने इसे आंदोलन के रूप में शुरू किया। सामाजिक समस्या, गरीबी, पिछड़ापन, भुखमरी, संसाधनों का अभाव, जमींदारों के अन्याय ने इसे जना और आगे चलकर हिंसा ने इसे पोसा। जो सामाजिक समस्याओं के कारण खड़ी हुई थी, जल्द ही राजनीति में प्रफुल्लित होने का प्रयत्न करने लगी। जमींदारी, अफसरशाही का जमकर विरोध हुआ, व्यवसाईयों को निशाना बनाया गया और इससे बलिष्ठ हुए साम्यवादी के नाम से चर्चित वाम मोर्चा ने सत्ता संभाल ली तथा 1977 में आपातकाल के बाद कांग्रेस फिर सत्ता में वापस नहीं आ पाई।

चलती रही अपराध और आतंक की सत्ता
वाम पंथियों के शासनकाल में भी अपराध और आतंक की सत्ता चलती रही। नक्सलवाद के पेड़ से ही उनकी उत्पत्ति थी, सो सत्ता और आतंक एक दूसरे के पूरक थे। पश्चिम बंगाल में लाल आंदोलन से व्यापार बंद हो गए। इसके बाद सिंगूर और उसके बाद नंदीग्राम आंदोलन हुआ। जिस पौधे को रोपकर वामपंथियों ने सत्ता प्राप्त की थी, उसी पौधे को खाद-पानी देकर ममता बनर्जी ने सिंगूर और नंदीग्राम में अपने लिए जमीन बनाई। यह लगभग पांच वर्ष तक चला। ममता सड़क, गांव में उतरकर आंदोलन करती रहीं और 2011 के चुनाव में उन्हें वह इच्छित फल की प्राप्ति हो गई, जिसकी उन्होंने कामना की थी। हिंसा फिर भी जारी रही।

राज्य में जारी रही हिंसा
अब ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की सत्ता थी लेकिन इतने वर्षों से बम, हथियार, झुंड की हिंसा से प्रभावित राज्य राजनीति की कठपुतली बनकर मौत का नाच करती रही। 2016 के चुनाव में वामपंथी सीमित हो गए और कांग्रेस अस्तित्व की लड़ाई लड़ने लगी। जब भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में सिर उठाने का प्रयत्न किया तो 2019 के लोकसभा चुनाव में उसे तृणमूल कांग्रेस ने गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन परिणामों ने उसे गंभीर कर दिया था। ममता बनर्जी को अपने अस्तित्व को लेकर खतरा महसूस होने लगा। इसकी परिणति ये रही कि 2021 के विधान सभा चुनावों में जमकर विरोध, छींटाकशी, राजनीतिक रंग और दंगा देखने को मिला।

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जारी है आतंक की आंधी
अब पश्चिम बंगाल का चुनाव परिणाम ममता बनर्जी को प्रफुल्लित कर चुका है। लेकिन आतंक की आंधी लगातार चल रही हैं। झुंड, हिंसा कर रहा है, लूट रहा है, मानवता को तार-तार कर रहा है और मानवता शर्मसार है और ममता मौन है।

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