जानें… क्या है ‘हवा’ अटैक जो कोविड-19 से ज्यादा जानें ले रही?

देश में प्रदूषण का बढ़तास्तर शहरों में जीवन को कम कर रहा है। दिल्ली में पराली जलानेवाला समय प्रतिवर्ष पूरे उत्तर भारत के लिए चिंता खड़ी करता है। इसके अलावा ग्रीन एनर्जी के उपयोग को लेकर प्रशासनिक उदासीनता और लोगों में अल्प जागरूकता अधिक क्षति पहुंचा रही है।

कोरोना से पूरा विश्व त्रस्त है। भारत में कोरोना ने बहुत कहर ढाया और अब भी शुरू है। लेकिन एक और दुश्मन है जो चिरस्थाई है और लंबे समय से जान ले रहा है। इसके द्वारा ली गई जान का आंकड़ा कोविड-19 से अधिक है और इससे सबसे अधिक प्रभावित देश के पांच शहर हैं। इस खतरे का नाम ‘हवा’ है और इसका अटैक देश में कोविड-19 से अधिक घात कर रहा है।

इस घाती हवा के बार में बताएं तो 2020 की इसकी गुणवत्ता (आईक्यू) रिपोर्ट सामने आई है। इसे ग्रीनपीस फाउंडेशन ने जारी किया है। इसके अनुसार पीएम 2.5 (PM 2.5) के कारण मात्र 2020 में ही 54 हजार लोगों को दिल्ली में जान गंवानी पड़ी। ये असामयिक मृत्यु थीं। जिसकी क्षति परिवार के अलावा देश के मानव संसाधन को भी भुगतनी पड़ रही है। ग्रीनपीस फाउंडेशन द्वारा जारी आंकड़े के अनुसार दिल्ली में ही इसके कारण 8.1 बीलियन अमेरिकी डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा।

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2020 में हवा की बिगड़ी गुणवत्ता की क्षति का आंकड़ा इस प्रकार है

देश के पांच शहरों में हवा की खराब गुणवत्ता पीएम2.5 (एयर क्लालिटी इन्डेक्स) से होनेवाली असामयिक मौतें 2020 की हैं। यह वह समय था जब देश में लॉकडाउन था। सड़कों पर गाड़ियां नहीं थीं, अधिकांश समय कल-कारखाने बंद थे।

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क्या है पीएम 2.5(PM 2.5)?
पीएम 2.5 यानी पार्टिकुलेट मैटर… यह मिश्रण है ‘घन’ और ‘द्रव’ पदार्थ का जो हवा में घुली होती है। इसे तीन स्तर पर वर्गीकृत किया गया है। मोटे, महीन और अति महीन। पीएम 2.5 वह प्रदूषित कण हैं जो हवा में आसानी से घुल जाते हैं और इनका घनत्व 2.5 माइक्रो मीटर होता है।

एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व के सबसे अधिक पीएम2.5 प्रभावित 20 शहरों में से 10 शहर भारत में हैं। इसके कारण इन शहरों के नागरिकों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इन शहरों में मृत्युदर 3-26 प्रतिशत तक अधिक हो सकती है। बच्चों में अस्थमा की समस्या 16 प्रतिशत, फेफड़ों का कैंसर 36 प्रतिशत, हृदय रोगियों की संख्या में 44 प्रतिशत सामान्य शहरों के तुलना में अधिक हो सकती है।

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