पुणेः एमपीएससी पास युवक ने लगाई फांसी! सुसाइड नोट में बताई ये वजह

पुणे के हडपसर फुरसुंगी इलाके में रहने वाला स्वप्निल लोनकर एमपीएससी प्रतियोगिता परीक्षा में उत्तीर्ण हो चुका था, लेकिन दो साल से उसे नौकरी नहीं मिली थी।

पिछले दो साल से देश में जारी कोरोना संक्रमण के कारण तमाम तरह की परेशानियों के बीच बढ़ती बेरोजगारी के साथ ही सरकारी नौकरी के लिए सभी तरह की परीक्षाएं पास करने के बावजूद नौकरी से वंचित रहना जैसे तनाव का साइड इफेक्ट बीच-बीच में सामने आते रहता है। ताजा मामला महाराष्ट्र के पुणे का है। पुणे के हडपसर फुरसुंगी इलाके में रहने वाला स्वप्निल लोनकर महाराष्ट्र पब्लिक सर्विस कमिशन यानी एमपीएससी प्रतियोगता परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो चुका था, लेकिन दो साल से उसे नौकरी नहीं मिली थी। निराश और हताश स्वप्निल ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। इस घटना के बाद विद्यार्थियों के साथ ही महाराष्ट्र की राजनीति में भी हड़कंप मच गया है।

स्वप्निल ने आत्महत्या करने से पहले सुसाइड नोट लिखा है, जिसमें उसने एमपीएससी को मयाजाल बताया है। स्वप्निल ने मौत को गले लगाने से पहले लिखा है, ‘एमपीएससी एक मायाजाल है, इसमें न पड़ो, मैं घबराया या परेशान नहीं हुआ, मेरे पास समय नहीं था।’

घटना के समय घर में अकेला था स्वप्निल
24 वर्षीय स्वप्निल लोनकर के पिता की पुणे के शनिवार पेठ में प्रिटिंग प्रेस है। उसके माता-पिता हर दिन वहां जाते हैं। दोनों रोज की तरह उस दिन भी अपने प्रेस में गए थे। स्वप्निल की बहन भी किसी काम से बाहर गई थी। जब वह दोपहर को घर पहुंची तो स्वप्निल का कहीं अता पता नहीं था। उसकी तलाश करते हुए जब वह उसके कमरे में गई तो देखा कि स्वप्निल फांसी के फंदे पर झूल रहा है। बहन ने तुरंत इस घटना की जानकारी अपने माता-पिता को दी। उसके बाद पड़ोसी और पुलिस को बुलाकर स्वप्निल को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

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स्वप्निल ने सुसाइड नोट में बताए आत्महत्या के कारण
स्वप्निल ने एमपीएससी की प्री और मेंस परीक्षा अच्छे नंबरों से पास की थी। उसे एमपीएससी में उत्तीर्ण हुए दो साल हो गए थे, लेकिन नौकरी नहीं मिली थी। इस वजह से वह परेशान था। उसने अपने सुसाइड नोट में लिखा हैः

‘एमपीएससी माया जाल है, इसके झांसे में न पड़ो, आने वाले दिनों में उम्र का बोझ बढ़ता जाता है। आत्मविश्वास कम हो जाता है और संदेह बढ़ते जाता है। परीक्षा पास कर दो वर्ष हो गए। इस बीच उम्र बढ़कर 24 साल हो गई। परीक्षा के लिए लिया गया पहाड़ जैसा लोन प्राइवेट नौकरी कर कभी नहीं चुकाया जा सकता। परिवार वालों की बढ़ती अपेक्षाएं, नकारात्मक सोच कितने दिनों से मन मे था, लेकिन उम्मीद थी कि कुछ अच्छा होगा, लेकिन इसके आगे जिंदगी अच्छी होगी, इसकी उम्मीद कम ही थी। मेरी आत्महत्या के लिए कोई जिम्मेदार नहीं है, यह मेरा अपना निर्णय है। मुझे माफ कर दो। 100 लोगों की जान बचानी थी, डोनेशन करके, 72 अभी बाकी हैं, हो सके तो उन तक पहुंचो, कई जिंदगियां बच सकती हैं।’

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