Body Donation: फिर जरूरत है दधीचि की, शपथ पत्र के बाद भी नहीं हो रहा देहदान

निरंतर विकसित होते विज्ञान के युग में आज पहले से कहीं अधिक दधीचि की आवश्यकता जरूरत बनकर आ गई है। देश में स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ीं हैं, मेडिकल कॉलेजों की संख्या भी बढ़ी है और इसके साथ ही स्वाभाविक रूप से एक और आवश्यकता भी बढ़ी है। यह आवश्यकता है मेडिकल कॉलेजों में कैडेवर यानी मृत देह की।

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पौराणिक साहित्य में तपस्या और पवित्रता की प्रतिमूर्ति महर्षि दधीचि (Maharishi Dadhichi) के देहदान का वर्णन मिलता है। सृष्टि के कल्याण के लिए महर्षि दधीचि का त्याग हर युग और हर काल के लिए प्रेरणा का एक अनुकरणीय अध्याय है। देवलोक की रक्षा के लिए दधीचि ऋषि ने उन देवराज इंद्र (Devraj Indra) को अपनी हड़्डियां दान करने की उदारता दिखाई थी, जिन्होंने कभी महर्षि दधीचि का घोर अपमान किया था।

मेडिकल कॉलेजों में कैडेवर की कमी
निरंतर विकसित होते विज्ञान के युग में आज पहले से कहीं अधिक दधीचि की आवश्यकता जरूरत बनकर आ गई है। देश में स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ीं हैं, मेडिकल कॉलेजों (medical colleges) की संख्या भी बढ़ी है और इसके साथ ही स्वाभाविक रूप से एक और आवश्यकता भी बढ़ी है। यह आवश्यकता है मेडिकल कॉलेजों में कैडेवर (Cadaver) यानी मृत देह की। मेडिकल कॉलेजों के एनॉटॉमी विभाग (Anatomy Department) में मेडिकल के विद्यार्थी (medical students) शरीर रचना का अध्ययन करते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में ऐसी खबरें आती रहती हैं कि देश के लगभग सभी मेडिकल कॉलेजों में कैडेवर की भारी कमी रहती है। इसके कारण विभाग प्रबंधन एक ही कैडेवर पर बहुत सारे छात्र-छात्राओं को प्रैक्टिकल कराने के लिए विवश होता है। जबकि मानव शरीर के संरचना विज्ञान में पारंगत होने के लिए अध्ययनकर्ताओं का बारीक व्यवहारिक प्रशिक्षण बेहद जरूरी है। केवल किताबी ज्ञान शरीरिक चिकित्सा शिक्षा को पूर्ण नहीं कर सकता ।

पंजीकरण और दान में भारी अंतर
देश में कई संस्थाएं हैं, जो देहदान (body donation) के लिए समुचित अनुकूलता प्रदान करने में अपनी सेवाएं दे रही हैं। इन्हें मात्र सूचना देनी होती है। संस्था या एनजीओ के सदस्य देहदान दाता के घर से लेकर हॉस्पिटल तक की पूरी व्यवस्था करते हैं। महर्षि दधीचि देहदान मंडल, डोंबिवली के संस्थापक देहदान के बाबत बताते हैं कि जितनी संख्या में देहदान के पंजीकरण होते हैं, उतनी संख्या में देहदान नहीं हो पाते । इसके कई कारण हैं। हमारे सामने एक बड़ी समस्या मृत्यु की जानकारी को लेकर आती है। परिवार के लोग देहदान का पंजीकरण कराए व्यक्ति की मौत की सूचना हमें देते ही नहीं। चुपके से जाकर उस व्यक्ति की अंतिम क्रिया कर देते हैं। जबकि हम पंजीकृत परिवार से बराबर संपर्क बनाने की कोशिश करते रहते हैं।

एनजीओ उपलब्ध कराते हैं सभी विकल्प
महर्षि दधीचि देहदान मंडल, डोंबिवली के अनुसार गत तीन माह में देहदान के लिए पंजीकृत आठ लोगों की मृत्यु हुई, लेकिन उनमें से केवल दो का ही देहदान हुआ। छह लोगों का विभिन्न कारणों से देहदान नहीं हो पाया। मंडल के संस्थापक कहते हैं कि परिवार के लोग हमसे समय पर संपर्क नहीं करते, जबकि हम देहदान कराने वाले डॉक्टर से लेकर वाहन तक की सुविधा उपलब्ध कराते हैं। यहां तक कि धार्मिक मान्यताओं के निर्वहन के लिए भी हम हर संभव विकल्प उपलब्ध कराते हैं। हम तो यहां तक सहूलियत रखते हैं कि लंबी दूरी से आने वाले रिश्तेदार एक बार मेडिकल कॉलेज जाकर भी मृतक के दर्शन कर सकते हैं। उत्तराधिकारियों को उन्हें यह बताना चाहिए और पहले से एक सुविधाजनक दिन और समय तय कर लेना चाहिए।

हस्तियां जो बन रहीं मिसाल
देश की कई बड़ी हस्तियों ने समय-समय पर देहदान करके देहदान की परोपकारी भावना को आगे बढ़ाया है। पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु, समाजसेवी भारत रत्न नानाजी देशमुख और विहिप नेता गिरिराज किशोर का मृत्योपरांत देहदान हुआ। इनके अलावा देश की कई जानी मानी शख्सियतों ने मृत्यु उपरांत अपनी बॉडी को दान देने का शपथ पत्र भर रखा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इसमें प्रियंका चोपड़ा, अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, नवजोत सिंह सिद्धू, आमिर खान, ऐश्वर्या राय बच्चन, सुनील शेट्टी, किरण शॉ मजुमदार, सलमान खान, नंदिता दास, गौतम गंभीर जैसी शख्सियतें शामिल हैं।

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