Bhagavad Geeta: दृढ़संकल्प और हठ के बीच अंतर

भगवद्गीता के श्लोक 18.26 से 18.28 में, श्रीकृष्ण ने उन गुणों के बारे में बताया है जो किसी काम को करने वाले व्यक्ति (कर्ता) में होने चाहिए; और उन लक्षणों का भी वर्णन किया।

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-विजय सिंगल

Bhagavad Geeta: भगवद्गीता के श्लोक 18.26 से 18.28 में, श्रीकृष्ण ने उन गुणों के बारे में बताया है जो किसी काम को करने वाले व्यक्ति (कर्ता) में होने चाहिए; और उन लक्षणों का भी वर्णन किया है जो उसमें नहीं होने चाहिए। काम के प्रति दृष्टिकोण के विषय में यह परामर्श दिया गया है कि व्यक्ति को उत्साह और दृढ़ता के साथ काम करना चाहिए; लेकिन उसमें कभी भी हठ या जिद (स्तब्ध:) का स्वभाव नहीं होना चाहिए। (Bhagavad Geeta)

इसके अलावा, श्लोक 18.33 से 18.35 में, श्रीकृष्ण ने ‘धृति’ गुण के अलग-अलग प्रकारों के बारे में विस्तार से बताया है। एक तरफ़ धृति’ को दृढ़ निश्चय, इच्छाशक्ति, संकल्प, प्रतिबद्धता और अडिग रहने की क्षमता कहा जाता है, तो दूसरी तरफ इसे हठ या जिद भी माना जाता है। इस तरह, ‘धृति’ के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों अर्थ होते हैं। इन श्लोकों में ‘धृति’ का वर्णन करते हुए, श्रीकृष्ण ने इसे भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटा है। कहा गया है कि वह अटूट संकल्प – जिसके द्वारा कोई व्यक्ति योग के माध्यम से इंद्रियों, मन और प्राण-शक्ति की गतिविधियों को नियंत्रित करता है – ‘सत्व गुण’ का संकल्प (सात्विक धृति) कहलाता है। वह संकल्प – जिसके द्वारा कोई व्यक्ति कर्मफल की इच्छा रखते हुए धर्म (उचित कर्म), काम (इंद्रिय-सुख) और अर्थ (धन-संचय) को अपनाए रखता है – ‘रजोगुण’ का संकल्प (राजसिक धृति) कहलाता है। और वह संकल्प – जिसके कारण गलत समझ (दुर्मेधा) वाला व्यक्ति शोक, निराशा, अहंकार, भय और दिवास्वप्न (दिन में सपने देखने) में उलझा रहता है – ‘तमोगुण’ का संकल्प (तामसिक धृति) कहलाता है। (Bhagavad Geeta)

इन तीन तरह के संकल्पों को समझने के लिए, आइए सबसे पहले तामसिक संकल्प के बारे में बात करते हैं। जो व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से झुकाव नहीं रखता, वह हठपूर्वक नकारात्मक सोच को पकड़े रहता है। अतीत की निराशाओं, पश्चातापों, अपराध-बोध और अपमान को भूलने के बजाय, ऐसा व्यक्ति अपने दु:ख को ज़िंदा रखने में ही अपना संकल्प लगाता है। वह अतीत के भावनात्मक बोझ से स्वयं को मुक्त करने से इनकार कर देता है, जबकि वह देख रहा होता है कि अतीत को पकड़े रहने से उसका वर्तमान बिगड़ा जा रहा है। ऐसा व्यक्ति बार-बार अतीत के भावनात्मक दर्द को पुनः पुनः महसूस करता है, सिर्फ इसलिए क्योंकि वह अतीत की चोटों और भूलों को क्षमा करने और भूलने के लिए तैयार नहीं होता। (Bhagavad Geeta)

ऐसे व्यक्ति की संकुचित सोच और गलत दिशा में लगे दृढ़ निश्चय के कारण, व्यक्ति अपने साथ होने वाली हर अच्छी घटना का पूरा श्रेय स्वयं ही ले लेता है। इससे अहंकार की भावना पैदा होती है, जिसका परिणाम अंततः दु:ख ही होता है। (Bhagavad Geeta)

वर्तमान पल पर ध्यान देने के बजाय, ऐसे लोग स्वयं सृजित काल्पनिक जगत में जीते हैं। वे एक दिन कोई बड़ी उपलब्धि प्राप्त करने का सपना तो देखते हैं, लेकिन उन सपनों को साकार करने के लिए कुछ करते नहीं। सदैव भविष्य के बारे में सोचते रहने के कारण, वे न केवल वास्तविक बल्कि काल्पनिक संकटों से भी डरने लगते हैं। (Bhagavad Geeta)

इस तरह, जिन लोगों में तामसिक प्रवृत्तियां हावी होती हैं, वे अपने गलत संकल्प के कारण दु:ख के उस दलदल में डूबे रहते हैं जिसे उन्होंने स्वयं ही बनाया और बनाए रखा है। इसीलिए श्रीकृष्ण ने ऐसे तामसिक लोगों को (राजसिक और सात्त्विक लोगों को नहीं) विकृत समझ वाला व्यक्ति कहा है। (Bhagavad Geeta)

तामसिक लोगों की मूर्खतापूर्ण हठ के विपरीत , राजसिक व्यक्ति पूरे समर्पण और एकाग्रता के साथ काम करता है। लेकिन उसके सभी कामों के पीछे मुख्य प्रेरणास्रोत, उन कामों से मिलने वाला अपेक्षित फल होता है। वह धन कमाना चाहता है और उस धन का आनंद भी लेना चाहता है। हालाँकि ऐसे लोग अपने सभी निजी और पेशेवर कर्तव्य पूरी लगन से निभाते हैं, लेकिन फिर भी जब उन्हें अपने कामों का फल तुरंत नहीं मिलता, तो उनका दृढ़ संकल्प डगमगाने लगता है। दूसरे शब्दों में, आशानुरूप परिणाम न मिलने पर उनका संकल्प कमजोर पड़ जाता है। व्यक्ति अपनी ही कोशिशों से निराश हो जाता है। (Bhagavad Geeta)

तामसिक और राजसिक दृष्टिकोण के विपरीत , श्रीकृष्ण सात्विक दृष्टिकोण का समर्थन करते हैं। इसमें कहा गया है कि व्यक्ति को आत्म-अनुशासन अपनाना चाहिए और जीवन के लक्ष्यों को दृढ़ता के साथ प्राप्त करने का निरंतरता प्रयत्न करना चाहिए। इस संदर्भ में, यह ध्यान देने वाली बात है कि ‘सात्विक संकल्प’ शब्द के साथ (श्लोक 18.33 में) ‘अव्यभिचारिणी’ (अटल) शब्द का इस्तेमाल किया गया है। इसका मतलब है सही मार्ग पर बिना थके प्रयत्न करते रहना, चाहे मनोवांछित परिणाम मिले या न मिले। (Bhagavad Geeta)

ऊपर की चर्चा में बताया गया है कि अलग-अलग तरह की ‘धृति’ (दृढ़ संकल्प) किसी व्यक्ति को कैसे प्रेरित करती है। वे उसकी बुद्धि पर कैसे असर डालती हैं, उसकी कोशिशों को कैसे बनाए रखती हैं और उसके पूरे व्यवहार को कैसे तय करती हैं। चूंकि भौतिक प्रकृति के तीन गुण – सात्विक, राजसिक और तामसिक – एक-दूसरे से अलग नहीं हैं, इसलिए एक आम इंसान में ये तीनों प्रवृत्तियाँ अलग-अलग परिमाण में दिखाई देती हैं। (Bhagavad Geeta)

इन तीनों तरह के संकल्पों को एक साथ पढ़ने और ठीक से समझने से व्यक्ति इन तीनों तरह के संकल्पों के बीच के अंतर को समझ पाता है। जहां तामसिक संकल्प का मतलब है ऐसा हठ जिससे इंसान बार-बार दु:ख की ओर बढ़ता है, वहीं राजसिक और सात्विक संकल्प व्यक्ति को उस आंतरिक शक्ति को विकसित करने के लिए प्रेरित करते हैं जो दीर्घ काल तक क्रमशः भौतिक विकास और शाश्वत आध्यात्मिक पूर्णता के लिए आवश्यक है। ऐसी समझ हासिल करने के बाद, कोई व्यक्ति अपने व्यवहार पर विचार कर सकता है। वह यह पता लगा सकता है कि क्या वह अपनी इच्छाशक्ति का प्रयोग भौतिक विकास और आध्यात्मिक उन्नति के लिए कर रहा है, या नकारात्मक व्यवहार के तरीकों से चिपके रहकर अज्ञानता के अंधेरे में और गहरा उतर रहा है। तब वह अपने विनाशकारी और विवशता के कारण किए जाने वाले व्यवहार से उबर सकता है और अपनी आंतरिक शक्ति को अच्छे भौतिक लक्ष्यों को पाने और आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने की दिशा में लगा सकता है। (Bhagavad Geeta)

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निष्कर्ष यह है कि व्यक्ति को अपने जीवन-लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए वास्तविक शक्ति, कभी-कभार उठने वाले जोश से नहीं, बल्कि सतत बने रहने वाले दृढ़ संकल्प से मिलती है। श्रीकृष्ण ने कहा है कि ऐसी शक्ति को अतीत के पश्चाताप या भविष्य की चिंता में बर्बाद नहीं करना चाहिए। इंसान को अपनी आध्यात्मिक जड़ों से जुड़े रहते हुए ही सांसारिक लक्ष्यों को हासिल करने का प्रयत्न करना चाहिए। (Bhagavad Geeta)

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