वह झटके झेल गई, अब भूकंप कैसे झेलेगी? जानें शिवसेना से कब-कब टूटे नेता

शिवसेना अपने कार्यकाल के कठिन काल में है। जिसे बालासाहेब ठाकरे ने पार्टी न कहकर पक्ष के दर्जे में खड़ा किया वहां अब नेताओं के आरोप लग रहे हैं कि, उनका पक्ष सुननेवाला अब कोई नहीं है।

शिवसेना ने नेताओं के असंतोष और पक्ष को छोड़ने की कई शृंखलाएं देखी हैं, जब नेताओं ने पक्ष से किनारा कस लिया। लेकिन उस काल में शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे का प्रखर नेतृत्व था, जो अब नहीं है। उस काल में जितने भी नेता गए वह मात्र एक सौम्य झटका जैसा ही लगा था, लेकिन वर्तमान में बड़ी संख्या में विधायकों का मुख्यमंत्री और शिवसेना पक्ष प्रमुख उद्धव ठाकरे के विरोध में जाना किसी भूकंप से कम नहीं है।

हिंदुत्व से हटे
शिवसेना में विद्रोह का पहला बिगुल सिद्धांतों को लेकर फूंका गया था। यह बिगुल फूंकनेवाले थे शिवसेना के संस्थापक सदस्य बंडू शिंगरे। जिन्होंने वर्ष 1974 में प्रखर हिंदुत्ववादी विक्रम सावरकर को लोकसभा चुनाव में समर्थन देने की मांग की थी। विक्रम सावरकर हिंदू महासभा के उम्मीदवार थे, लेकिन शिवसेना ने कांग्रेस के रामराव आदिक को समर्थन दिया और हिंदुत्ववादी बंडू शिंगरे को बाहर का रास्ता दिखा दिया। शिवसेना के समर्थन के बाद भी कांग्रेस के रामराव आदिक तीसरे स्थान पर रहे।

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छगन भुजबल का शिवसेना को जय महाराष्ट्र
छगन भुजबल अपनी प्रखर वाणी के आधार पर कट्टर शिवसैनिक और बाद में वर्ष 1985 में मुंबई महानगर पालिका में शिवसेना के प्रथम महापौर बने। 1990 के विधान सभा चुनाव में शिवसेना के 52 विधायक सदन में पहुंचे थे। छगन भुजबल को आशा थी कि, नेता प्रतिपक्ष का पद शिवसेनाप्रमुख उन्हें सौंपेंगे, परंतु ऐसा नहीं हुआ और मनोहर जोशी को नेता प्रतिपक्ष बनाया गया। यह छगन भुजबल को खटक गया और वर्ष 1991 में नागपुर सत्र के समय नौ शिवसेना विधायकों के साथ छगन भुजबल ने कांग्रेस में प्रवेश किया। उस समय शिवसेना का नेतृत्व शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे के हाथों था। छगन भुजबल के दल बदल का कोई प्रभाव शिवसेना पर नहीं पड़ा। इस घटना से क्षुब्ध बालासाहेब ठाकरे ने छगन भुजबल को नाम दिया ‘लखोबा लोखंडे’।

नई मुंबई के छत्रप ने छोड़ी शिवसेना
गणेश नाईक को नई मुंबई का छत्रप कहा जाता रहा है। संसदीय सीट से लेकर महानगर पालिका तक गणेश नाईक और उनके समर्थकों का बोलबाला रहा है। गणेश नाईक शिवसेना में रहे हैं, 1995 में शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी की जब युति हुई और पहली बार इन दोनों दलों ने सरकार बनाई तो उसमें गणेश नाईक को पर्यावरण मंत्री और ठाणे जिले का गार्जियन मिनिस्टर बनाया गया। इससे गणेश नाईक नाराज थे, इसकी परिणति 1999 में देखने को मिली जब शरद पवार ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की स्थापना की। उस समय गणेश नाईक ने शिवसेना छोड़ एनसीपी का दामन थाम लिया।

नारायण भी छोड़ गए साथ
नारायण राणे और उद्धव ठाकरे के बीच अनबन का पुराना इतिहास रहा है। शिवसेनाप्रमुख के काल में ही दोनों नेताओं के बीच विरोध के स्वर उठे थे। एक ओर उद्धव ठाकरे, मनोहर जोशी थे, तो दूसरी और नारायण राणे और राज ठाकरे थे। वर्ष 2003 में महाबलेश्वर में शिवसेना की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक आयोजित की गई थी। जिसमें राज ठाकरे ने पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में उद्धव ठाकरे के नाम की घोषणा की थी। इसका उस समय नारायण राणे ने विरोध किया था। इसके बाद विधान सभा चुनावों में नारायण राणे ने उद्धव ठाकरे पर निशाना साधते हुए टिकट बेचने का आरोप लगाया। इससे संबंध अधिक बिगड़ गए और वर्ष 2005 में दस विधायकों के साथ नारायण राणे कांग्रेस में शामिल हो गए।

राज ने भी छोड़ा साथ
शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे बचपन से ही शिवसेनाप्रमुख के सानिध्य में रहे। उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ऐसी जोड़ी थी, जिसका उल्लेख बालासाहेब ठाकरे अपने साक्षात्कारों में भी करते रहे हैं। लेकिन यह जोड़ी जैसे-जैसे बढ़ी इसमें पक्ष में पद को लेकर वैमनस्य उपजने लगा। बालासाहेब ठाकरे की आवाज, उनकी शैली की हूबहू कॉपी थे राज ठाकरे। परंतु, जब कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में उद्धव ठाकरे की नियुक्ति हुई तो दोनों के बीच खाई बढ़ने लगी। इसकी परिणति हुई कि, वर्ष 2005 में राज ठाकरे ने शिवसेना को जय महाराष्ट्र कर दिया। राज ठाकरे ने कहा था कि, मैं विट्ठल के कारण नहीं अपितु, विट्ठल के आसपास के पंडों के कारण शिवसेना छोड़ रहा हूं। राज ठाकरे के साथ उस समय विधायक बाला नांदगावकर और बड़ी संख्या में राज समर्थक गए थे।

एकनाथ का झटका अनाथ न कर दे!
शिवसेना के 56 वर्षों के काल में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में जो असंतोष सामने आया है, वह भूकंप से कम नहीं है। 55 विधायकों में से 2/3 विधायकों से अधिक के विद्रोह करने की स्थिति है। ऐसे में अब परिस्थिति यह बन गई है कि, विधान सभा में शिवसेना किसके हाथ होगी यह सबसे बड़ा संकट है। इसका दूसरा अर्थ यह है कि, अपनी ही पार्टी से उद्धव ठाकरे क्या बेदखल हो जाएंगे यह स्थिति बन गई है।

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