Tariff War: अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) ने हाल ही में ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट 2026’ को अंतिम वोटिंग प्रक्रिया के लिए आगे बढ़ा दिया है। अगस्त 2026 में अमेरिकी सीनेट से 86-11 के भारी बहुमत से पारित होने के बाद, यह विधेयक अमेरिकी हाउस के प्रक्रियात्मक चरण को पार कर चुका है।(Tariff War)
यह विधेयक अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले दुनिया के 5 सबसे बड़े आयातक देशों (जिनमें भारत और चीन प्रमुख हैं) से आयातित सामानों पर 100% तक द्वितीयक शुल्क (Secondary Tariffs) लगाने का अधिकार देता है।(Tariff War)
बिल का मुख्य उद्देश्य और प्रावधान
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रूसी राजस्व पर चोट: विधेयक का प्राथमिक उद्देश्य रूस को ऊर्जा क्षेत्र से मिलने वाले राजस्व को सीमित कर यूक्रेन युद्ध के लिए उसके वित्तपोषण को रोकना है।(Tariff War)
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शीर्ष 5 आयातक निशाने पर: कानून की धारा 113 के तहत, पिछले 12 महीनों में रूस से सबसे ज्यादा मात्रा में क्रूड ऑयल या गैस खरीदने वाले शीर्ष 5 देशों के उत्पादों पर 100% तक अतिरिक्त आयात शुल्क लागू किया जा सकता है।
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राष्ट्रपति को विशेष अधिकार: अमेरिकी राष्ट्रपति या USTR के पास अधिकार होगा कि यदि कोई देश रूस से आयात में कटौती करता है, तो शुल्क दरों को 0% से 100% के बीच समायोजित या पूरी तरह से माफ कर सकते हैं।
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शैडो Fleet पर सख्ती: इसके अतिरिक्त, यह विधेयक रूस के कच्चे तेल के अवैध परिवहन में शामिल ‘शैडो फ्लिट’ जहाजों और लेनदेन में मदद करने वाले विदेशी बैंकों पर भी सख्त पाबंदियां लागू करता है।(Tariff War)
भारतीय अर्थव्यवस्था पर संभावित असर
अमेरिका, भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों और निर्यात गंतव्यों में से एक है। यदि यह विधेयक कानून बनकर भारत पर लागू होता है, तो इसके निम्नलिखित प्रभाव देखने को मिल सकते हैं:
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भारतीय निर्यात पर आघात: अमेरिका को निर्यात होने वाले भारतीय सामानों जैसे आईटी, टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स, डायमंड व ज्वेलरी, और ऑटो पार्ट्स पर 100% टैरिफ लगने से अमेरिकी बाजार में ये उत्पाद अत्यधिक महंगे हो जाएंगे।
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ऊर्जा नीति और रिफाइनिंग सेक्टर पर दबाव: रूस से मिलने वाला रियायती कच्चा तेल भारत की ऊर्जा सुरक्षा और मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने में महत्वपूर्ण रहा है। यदि भारत को रूसी तेल का आयात कम करना पड़ता है, तो महंगे क्रूड की वजह से चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ सकता है।
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रुपये की विनिमय दर पर असर: आयात बिल बढ़ने और निर्यात राजस्व घटने से भारतीय रुपये पर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले दबाव बढ़ सकता है।(Tariff War)
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भारत सरकार का रुख और रणनीतिक विकल्प
– राष्ट्रीय हित और ऊर्जा सुरक्षा: विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारत की रूस के साथ ऊर्जा साझेदारी राष्ट्रीय हित और घरेलू ऊर्जा आवश्यकताओं पर आधारित है।(Tariff War)
– डिप्लोमैटिक वेवर: कानून में अमेरिकी राष्ट्रपति को छूट देने का अधिकार है। भारत द्विपक्षीय व्यापारिक वार्ताओं के माध्यम से इस छूट को हासिल करने का प्रयास कर सकता है।
– सप्लाई चेन का विविधीकरण: भारत अपने आयातित कच्चे तेल के स्रोतों का दायरा और विस्तृत करने तथा अमेरिका के साथ व्यापारिक संतुलन स्थापित करने की रणनीति पर काम कर सकता है।(Tariff War)

