सुभाषचंद्र बोस ने भी किया था स्वातंत्र्यवीर सावरकर का अनुसरण!

सशस्त्र क्रांति का समर्थन, अभिनव भारत का सैन्य विद्रोह, 1857 का स्वातंत्र्य समर, जोसेफ मैजिनी के जीवनी की प्रस्तावना और रासबिहारी बोस व स्वातंत्र्यवीर सावरकर के मध्य हुए गुप्त पत्र व्यवहारों के अध्ययन के बाद एक सबसे बड़ी सच्चाई जो सामने आती है वो ये है कि, नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने स्वातंत्र्यवीर सावरकर के मार्गों का अनुसरण किया था।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस आजाद हिंद फौज के सुप्रीम कमांडर थे। उनका दिया ‘जय हिंद’ का नारा पूरे विश्व में आज भी लगता है। नेताजी सशस्त्र क्रांति के जिस मार्ग का अनुसरण करते थे और जिसका बहुत सम्मान करते थे उनका नाम है स्वातंत्र्यवीर सावरकर। इन दोनों नेताओं के विचारों में स्वतंत्रता क्रांति को लेकर बहुत सारी एकरूपता थी।

भारत के दो महान क्रांतिकारी नेतृत्वों ने देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिए सशस्त्र क्रांति को मार्ग स्वीकार किया था। नेताजी ने कहा ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूंगा’ तो स्वातंत्र्यवीर सावरकर का युवाओं के लिए मंत्र था कि, ‘हिंदू युवकों, तरुणियों के केशों में घूमनेवाली तुम्हारी उंगलियां जब बंदूक की ट्रिगर पर घूमने लगेंगी तभी और सिर्फ तभी हिंदुस्थान जगेगा’

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अब बात उस दिन कि जब मुंबई में नेताजी सुभाषचंद्र बोस आए थे और उन्होंने स्वातंत्र्यवीर सावरकर से भेंट की। वैसे इन दोनों क्रांतिकारी नेताओं के मध्य कुल तीन भेंट हुई थीं। जिसमें से कि पहली भेंट किसी गुप्त स्थान पर हुई थी। लेकिन दूसरी भेंट 4 मार्च, 1938 को हुई। इस समय तक नेताजी सुभाषचंद्र बोस कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए थे। वे मुंबई में जब स्वातंत्र्यवीर से मिले तो उन्होंने स्वातंत्र्यवीर से कांग्रेस से जुड़ने का आग्रह किया। इस पर इन दोनों नेताओं की बृहद् चर्चा हुई।

स्वातंत्र्यवीर ने सुभाषचंद्र बोस से कहा कि, कांग्रेस हिंदू महासभा को जातिवादी संस्था मानती है और जातीयतावादी संस्था का पदाधिकारी कांग्रेस में किसी पद पर नहीं बैठ सकता। इसलिए कांग्रेस में रहकर मुझे अपने विचारों को सभी के समक्ष रखने का अवसर ही नहीं मिल पाएगा।

स्वातंत्र्यवीर की बात सुनने के बाद नेताजी बोले, मुझे ये नियम मुझे मान्य नहीं है। इस नियम के विरुद्ध हम प्रयत्न करेंगे।

22 जून 1940 को दोनों क्रांतिकारी नेता फिर मुंबई में मिले। इसमें दोनों के मध्य जापान में रह रहे रासबिहारी बोस पर चर्चा हुई। स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने इस भेंट में रासबिहारी बोस और उनके मध्य हुए गुप्त पत्र व्यवहारों के बारे में जानकारी दी।

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और वो क्रांतिकारियों की गीता बन गई

  • सन 1908 में स्वातंत्र्यवीर सावरकर द्वारा लिखित ‘द फर्स्ट इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस-1857’ का उल्लेख करते हुए धनंजय कीर लिखते हैं कि, यह ग्रंथ क्रांतिकारियों की गीता साबित हुई। 1928 में भगत सिंह और उनके साथियों ने इस ग्रंथ की एक आवृत्ति छापी जिससे क्रांति के लिए प्रेरणा जगाने का कार्य आगे बढ़ा साथ ही उनके कार्य के लिए आर्थिक सहायता जुटाने में मदद मिली।
  • इस ग्रंथ को 1942 में जर्मनी में फ्रैंड्स ऑफ सोसायटी द्वारा छापा गया।
  • 1943 में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व में लड़े जा रहे तीसरे स्वतंत्रता संग्राम में स्वातंत्र्यवीर सावरकर का यह ग्रंथ क्रांतिकारियों का मूल मंत्र बन गया। आजाद हिंद सेना की बटालियन, डिवीजन, प्रेरणा गीत सभी स्वातंत्र्यवीर सावरकर के ग्रंथ से प्रभावित थे।
  • इसे लेकर केएफ नरीमन ‘द हिंदुस्थान’ साप्ताहिक में अपने लेख ‘द सावरकर स्पेशल नंबर’ में लिखते हैं, “आजाद हिंद फौज का विचार और उसमें भी झांसी की राणी रेजिमेंट का उद्भव 1857 की क्रांति पर लिखे वीर सावरकर के ग्रंथ से हुआ प्रतीत होता है।”

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