जानें इन तीन बिंदुओं पर छूटा आर्यन खान

आर्यन खान की जमानत के लिए न्यायालय में शीर्ष अधिवक्ता लगे थे। जिन्होंने इस प्रकरण को इस रूप में न्यायालय के समक्ष रखा कि आर्यन खान को जमानत मिल गई।

आर्यन खान को 26 दिनों की जेल के बाद बॉम्बे उच्च न्यायालय से जमानत मिली है। इसके लिए देश सर्वश्रेष्ठ वकीलों की पूरी सेना लगी थी। इसमें देश के पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी और वरीष्ठ अधिवक्ता सतीश मानेशिंदे के साथ बड़ी लीगल टीम थी।

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इस टीम ने तीन मुद्दों पर आर्यन खान के प्रकरण को प्रस्तुत किया।

1. न साजिश, न सेवन और न बरामदगी – इस प्रकरण को देश के पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने उच्च न्यायालय में प्रस्तुत किया, जिसमें सतीश मानेशिंदे भी शामिल थे। शीर्ष अधिवक्ताओं के इस दल ने उच्च न्यायालय के समक्ष एक बात स्पष्ट रूप से रखा कि, कार्डीलिया क्रूज प्रकरण में आर्यन खान ने ड्रग्स का सेवन नहीं किया था और न उसके पास से कोई ड्रग्स बरामद की गई और न ही साजिश में शामिल होने के कोई स्पष्ट साक्ष्य मौजूद हैं। ऐसे में एनसीबी द्वारा गिरफ्तार किया जाना और 26 दिन तक जेल में रखना व्यक्ति के अधिकारों का हनन है।

2. राजनीतिक लड़ाई से दूरी – शीर्ष अधिवक्ताओं ने जमानत याचिका की सुनवाई में आर्यन खान के प्रकरण को राजनीति और प्रशासनिक द्वंद से दूर रखा। जब इस प्रकरण में मजिस्ट्रेट न्यायालय से सत्र (एनजीपीएस) न्यायालय और उच्च न्यायालय में जमानत के लिए सुनवाई हो रही थी, उस पूरे काल में बाहर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) विरुद्ध नार्कोटिक कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) चल रहा था। एनसीपी प्रवक्ता नवाब मलिक प्रतिदिन एनसीबी के विभागीय संचालक समीर वानखेडे और उनके परिवार पर आरोपों के तोप दाग रहे थे, इससे आर्यन खान के वकीलों ने दूरी बनाए रखी। इस प्रकरण पर अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने स्पष्ट किया था कि, मेरा इन प्रकरणों (एनसीपी, एनसीबी और पंच) से कोई सरोकार नहीं है। मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है, मैं अपने प्रकरण को राजनीतिक नेताओं या पंचों के सहारे खराब नहीं करना चाहता, क्योंकि मैं किसी से संबंधित नहीं हूं।

3. सेक्शन 67 की उपयोगिता और तूफान सिंह प्रकरण का उदाहरण – आर्यन खान के काउंसिल मुकुल रोहतगी ने इस प्रकरण में एनडीपीएस सेक्शन 67 की उपयोगिता पर सवाल उठाए। इसके लिए उन्होंने तुफान सिंह प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का उदाहरण दिया। इस निर्णय में कहा गया है कि, एनडीपीएस एक्ट के अंतर्गत केंद्रीय या राज्य सरकार के अधिकारी पुलिस अधिकारी होते हैं। इसलिए उनके समक्ष की गई स्वीकारोक्ति (कन्फेशन) अमान्य है।

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