ब्रिटिश काल के कानून देश के लिए क्यों हैं खतरनाक? जानिये, अधिवक्ता अंकुर शर्मा की राय

8 अगस्त से दिल्ली में जंतर मंतर समेत पूरे देश में 222 ब्रिटिश काल के कानूनों को खत्म करने के लिए आंदोलन चलाया जा रहा है।

हमारी वर्तमान ‘भारतीय कानूनी व्यवस्था’ ब्रिटिश उपनिवेशवाद की विरासत है। इक्कजुट्ट जम्मू संगठन के अध्यक्ष और जम्मू उच्च न्यायालय के वकील अंकुर शर्मा ने कहा कि ये 1857 के विद्रोह के बाद भारतीयों पर अत्याचार और उन्हें गुलाम बनाए रखने के लिए अंग्रेजों द्वारा बनाए गए कानून हैं।

‘देश पर दूसरे लोगों का नियंत्रण’
बता दें कि 8 अगस्त से दिल्ली में जंतर मंतर समेत पूरे देश में 222 ब्रिटिश काल के कानूनों को खत्म करने के लिए आंदोलन चलाया जा रहा है। इस पृष्ठभूमि में शर्मा हिंदू जनजागृति समिति द्वारा आयोजित ‘भारतीय कानून और व्यवस्था: परिवर्तन की आवश्यकता’ पर एक ऑनलाइन विशेष संवाद में बोल रहे थे। इस अवसर पर बोलते हुए अधिवक्ता अंकुर शर्मा ने आगे कहा कि आज भी देश में एक समान नागरिक कानून नहीं है, गोवध करने वालों के लिए मृत्युदंड या आजीवन कारावास जैसी सजा नहीं है, जनसंख्या नियंत्रण और सख्त आतंकवाद विरोधी कानूनों का कड़ा विरोध किया जाता है। ऐसे कई कानून हैं, जो देश के हित में नहीं हैं। इसके बावजूद उन्हें बदला नहीं जा रहा है। यह इस बात का संकेत है कि हमारे देश का नियंत्रण दूसरों के हाथों में चला गया है। शर्मा ने कहा कि भारतीय आस्था और संस्कृति पर आधारित कानूनों को देश में लागू किया जाना चाहिए।

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‘अंग्रेजों द्वारा बनाए गए कानून का उद्देश्य ईसाई धर्म का प्रचार’
राजस्थान उच्च न्यायालय के वकील मोतीसिंह राजपुरोहित ने कहा कि प्रत्येक देश के कानून उस देश के प्रमुख धर्मों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अंग्रेजों द्वारा बनाए गए कानून का मूल उद्देश्य ईसाई धर्म का प्रचार था। चूंकि उन कानूनों में भारत के सांस्कृतिक और धार्मिक मूल्यों को नष्ट करने की अवधारणा है, इसलिए उन्हें निरस्त किया जाना चाहिए। भारतीयों की आस्था और संस्कृति पर आधारित कानूनों को देश में लागू किया जाना चाहिए।

‘कानून देश की आत्मा’
लश्कर-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष ईश्वर प्रसाद खंडेलवाल ने कहा कि कानून देश की आत्मा होता है। यदि हम अभी भी भारतीयों को गुलाम बनाने और उन्हें लूटने के साथ-साथ उनके साथ अन्याय करने के लिए अंग्रेजों द्वारा बनाए गए कानूनों को स्वीकार करते हैं, तो हम वास्तव में स्वतंत्र नहीं हैं। उन्होंने कहा कि बड़ी अजीब बात है कि हमारे देश में सर्वोच्च न्यायालय रात में आतंकियों के लिए खुला रहता है और संतों के लिए नहीं। आज भी न्यायपालिका में बैठे लोग धर्म या भारतीय परंपरा से परिचित नहीं हैं। इसलिए उनके द्वारा लिए गए अधिकांश निर्णय भारतीय संस्कृति के विरुद्ध होते हैं, जिन्हें भारतीय कभी स्वीकार नहीं करेंगे।

‘हिंदुओं के साथ अन्याय’
हिंदू विद्यीज्ञ परिषद के संगठक अधिवक्ता नीलेश सांगोलकर ने कहा कि क्रांतिकारियों और भारतीयों को सताने के लिए अंग्रेजों द्वारा बनाए गए 222 कानून आज भी लागू हैं। वहीं, ‘पूजा स्थल अधिनियम’ जैसे कई धर्म विरोधी कानून हैं, जिससे हिंदुओं के साथ धार्मिक अन्याय होता है। इसके खिलाफ भी हमें संघर्ष करना होगा।

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