वीर सावरकर सदी के सबसे बड़े महापुरुष – उदय माहूरकर

वीर सावरकर कालापानी मुक्ति शताब्दी व्याख्यानमाला में चतुर्थ संबोधन भारत सरकर के सूचना आयुक्त उदय माहूरकर का था।

स्वातंत्र्यवीर सावरकर क्रांतिकारी ही नहीं एक विचारक थे। उनके विचारों को मानते तो भारत का विभाजन नहीं होता। उनका हिंदुत्व बिन शर्त का राष्ट्रवाद है। वीर सावरकर के इन मंत्रों को वीर सावरकर कालापानी मुक्ति शताब्दी व्याख्यानमाला में भारत सरकार के सूचना आयुक्त उदय माहूरकर ने रखा। उन्होंने कहा कि भारत की प्रगति के लिए जनसंख्या नियंत्रण आवश्यक है और इसके लिए समान नागरी संहिता लागू होना चाहिये।

उदय माहूरकर ने स्वातंत्र्यवीर सावरकर द्वारा सौ वर्ष पहले व्यक्त किये गए विचारों की यथार्थता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा आज वीर सावरकर को वामपंथी और पैन इस्लामिस्ट बदनाम करते हैं। वीर सावरकर एक क्रांतिकारी तो थे ही, लेकिन इसके साथ ही वे एक प्रबल राष्ट्रवादी विचारक भी थे। उनके विचार ही थे जिसके कारण भारत सुरक्षित रह पाया।

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सावरकर भारत की सुरक्षा के राष्ट्रपिता
स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने 1938 में ही भांप लिया था कि सेना मे हिंदुओं की संख्या कम है। जबकि इसकी तुलना में मुस्लिम बहुत अधिक थे। इसके लिए वीर सावरकर ने इस काल में युवाओं से सेना में जुड़ने का आह्वान किया। उनकी नीति थी ‘हिंदुवाइज्ड पॉलिटिक्स, मिलिटराइज्ड हिंदू’। उनके प्रचारों का लाभ भारत को हुआ। युवक बड़ी संख्या में सेना से जुड़े और आजाद हिंद फौज को उसका लाभ मिला। पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला किया था। यदि वीर सावरकर के अनुसार सेना में हिंदू बहुसंख्य न होते तो पाकिस्तान बंगाल, राजस्थान में भी हमले करता। उन्होंने आठ वर्ष पहले ही चीन के आक्रमण की भविष्यवाणी कर दी थी। पंडित जवाहरलाल नेहरू जब पंचशील सिंद्धांत ले आए तो एक सिरे से वीर सावरकर ने उसे अस्वीकार करते हुए आगाह किया कि यदि इसे मानते हैं तो एक दिन चीन भारत पर हमला करेगा और हमारे भूभाग पर कब्जा कर लेगा। इस विषय में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के गोलवलकर गुरु जी ने भी आगाह किया था लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने इसे नहीं माना।

क्रांतिकारियों के कारण मिली स्वतंत्रता
भारत को स्वतंत्र करने की घोषणा करनेवाले ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली वर्ष 1956 में भारत आए थे। उस समय वे प्रधानमंत्री नहीं थे और भारत निजी यात्रा पर आए थे। वे पश्चिम बंगाल के गवर्नर पीबी चक्रवर्ती के मेहमान थे और दो दिन तक कोलकाता के गेस्ट हाउस में रुके थे। उस समय उनसे कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और कार्यकारी राज्यपाल पीबी चक्रवर्ती ने पूछा कि आखिर गांधी का क्विट इंडिया मूवमेंट भी ठंडा पड़ गया था और ऐसी कोई परिस्थिति भी नहीं थी तो ब्रिटिश सरकार ने भारत को सत्ता क्यों सौंपी?
क्लेमेंट ऐटली ने जो उत्तर दिया उसमें तीन बातें प्रमुख थीं।

  • एक अलग सी मुस्कान भरते हुए क्लेमेंट ऐटली ने कहा ब्रिटिशों द्वारा भारत को स्वतंत्र करने में गांधी की भूमिका न्यूनतम थी।
  • द्वितीय विश्व युद्ध समाप्ति के पश्चात आजाद हिंद फौज के सैनिकों ने देश को स्वतंत्र करने की मांग कर दी थी। इससे ब्रिटिश सत्ता हिल गई थी। उन्हें सैनिकों के विद्रोह का आभास हो गया था।
  • 1946 में 20 हजार नौसिक जो रॉयल इंडियन नेवी के 78 जंगी बेड़ों पर तैनात थे, उन्होंने विद्रोह कर दिया, यूनिय जैक का झंडा उतार दिया। इसके पीछे-पीछे रॉयल इंडियन एयर फोर्स के जबलपुर यूनिट ने भी विद्रोह कर दिया। इससे ब्रिटिश सत्ता हिल गई थी।

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कॉमन सिविल कोड आवश्यकता
समान नागरी संहिता (कॉमन सिविल कोड) बहुत आवश्यक है। भारत तब तक विश्व गुरु नहीं बन सकता जब तक जनसंख्या नियंत्रित नहीं होती। हम तो नियंत्रित हैं लेकिन उनके भी नियंत्रित होने की आवश्यकता है।

तुष्टीकरण के कारण बना पाकिस्तान
कांग्रेस ने हमेशा ही मुस्लिम तुष्टीकरण किया। इसी कारण मुस्लिमों का मन बढ़ गया। मोहम्मद अली जिन्ना ने जब पाकिस्तान का प्रस्ताव पेश किया था तो उन्हें भी विश्वास नहीं था कि यह मान्य हो जाएगा। मूल रूप से स्वतंत्र राष्ट्र की पहली मांग इकबाल ने वर्ष 1905 में की थी। इसके पश्चात 1930 में रहमत चौधरी ने इसे पाकिस्तान नाम दिया। रहमत चौधरी ने एक किताब भी लिखी थी जिसमें पाकिस्तान के अलग होने के बाद भी सात नए पाकिस्तान उन्होंने बताए थे, इसके नाम और क्षेत्र के साथ।

हमने तो सब भुला दिया। यह भी कि बंटवारे में 15 लाख हिंदू और सिखों की जान गई थी, 99 प्रतिशत महिलाओं की इज्जत लूटी गई थी। लेकिन इस पर पर्दा डाला गया और मुस्लिम तुष्टीकरण की नीतियां जारी रखी गई। इसके लिए हिंदुओं के अधिकारों का हनन किया गया।

पाकिस्तान बन गया तब भी आयोध्या, काशी और मथुरा क्यों नहीं मिला
उदय माहूरकर ने कहा कि पाकिस्तान का बंटवारा हो चुका था। उसके बाद का भारत हिंदुओं का था और उनका था जिन्हें इस राष्ट्र से प्रेम था। यह सच था कि बहुसंख्य हिंदुओं के मंदिरों को तोड़ा गया था। हिंदू सभी मंदिर पुन: स्थापित करने की मांग नहीं कर रहे थे। वे तो मात्र तीन मंदिर आयोध्या, काशी और मथुरा ही मांग रहे थे। तो इसका इतना विरोध क्यों होता है? हमें सतर्क और एकजुट रहना होगा। 370 और राम मंदिर त एक प्रारंभ है अभी आगे बहुत राह बाकी है।

सीएए का विरोध बड़ी साजिश थी
संशोधित नागरिकता कानून (सिटिजन अमेंडमेंट ऐक्ट) के विरोध में शाहीन बाग का आंदोलन करना एक सोची समझी रणनीति के अंतर्गत किया गया था। इसे इस प्रकार से किया गया कि देश में सरकार के प्रति गलत संदेश जाए। वैश्विक स्तर पर उन्होंने देश की बदनामी की। जबकि, मुस्लिमों को यूरोप ने अपने यहां शरणार्थी के रूप में आने दिया। वे वहां कट्टरवादी रूप आपना लिये। अब अधिकारों की मांग होने लगी है। ये सभी देश अब परेशान हैं। हमें एक बड़ा अभियान छेड़ना पड़ेगा। बंगाल में जो हो रहा है उससे खतरा है।

सब मुस्लिम कट्टरवादी नहीं
हमें राष्ट्रवादी मुस्लिमों को साथ लेकर चलना होगा। भले ही उनकी संख्या कितनी ही कम क्यों न हो लेकिन एक भी मुस्लिम को यदि कट्टरवादी कहकर नहीं जोड़ पाए तो बहुत गलत होगा। मुस्लिमों से बातचीत स्थापित करना होगा तभी समस्या का हल निकलेगा। वीर सावरकर ने कहा था जो लड़ाई में साथ आएगा उसके साथ, जो नहीं आएगा उसके बगैर और जो विरोध करेगा उसके साथ शत्रुओं जैसा व्यवहार करेंगे।

1938 में शिया मुलमानों ने गौ हत्या के विरोध में प्रस्ताव पास किया ता। इसका उल्लंघन करनेवाले को हिंदू मुस्लिम एकता विरोध कहा जाता था। मानवाधिकार के नाम पर आतंकियों का समर्थन किया जा रहा है। दाऊद के लिए काम करनेवाले सोहराबुद्दीन के लिए तीन महीने अमित शाह को जेल में रहना पड़ा। इशरत जहां पर हो हल्ला मचाया गया, लेकिन जब अमेरिका में गिरफ्तार डेविड हेडली ने उसके लश्कर ए तोयबा की मोड्यूल होने का खुलासा किया तो सब चुप हो गए। हम तो अशफाक उल्ला, अब्दुल हमीद आदि का सम्मान करते हैं।

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