बंगाल में जो हुआ वो कश्मीर पार्ट टू है – पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ

स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक द्वारा आयोजित वीर सावरकर कालापानी मुक्ति शताब्दी व्याख्यानमाला के अंतिम पुष्प में पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ ने संबोधित किया। यह पुष्प कोरोना संक्रमण के कारण दूरदृष्टि के माध्यम से एक प्रतिबद्धता के साथ संपन्न हुआ कि, अगले वर्ष समस्त राष्ट्राभिमानियों को एकसूत्र में जोड़ने के लिए वीर सावरकर कालापानी मुक्ति शताब्दी यात्रा का आयोजन होगा।

वीर सावरकर कालापानी मुक्ति शताब्दी व्याख्यानमाला में पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में आरक्षण की आवश्यकता, वीर सावरकर पर निराधार टिप्पणियां करनेवालों पर लगाम लगाने, बंगाल के कश्मीर पार्ट टू होने और उत्तराखण्ड के हाथ से निकलने के मुद्दे को रखा। उन्होंने कहा कि हिंदुओं ने सरकार के समक्ष शरणागति स्वीकार कर ली है, जबकि उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए स्वयं खड़ा होना पड़ेगा। हिंदुओं के सैकड़ो संगठन हैं लेकिन सभी स्वार्थ लोलुपता के जाल में जकड़े हुए हैं।

सत्ताएं डरती हैं
वे कहते हैं कि, भारत की विडंबना है कि वीर सावरकर को अपने भाषणों और कार्यालय में उनकी फोटो लगाने तक ही राजनीतिक नेतृत्वों ने सीमित कर रखा है। वीर सावरकर के प्रखर विचारों से सत्ताएं डरती हैं। ऐसे नेताओं में भय है कि कहीं उनकी निरंतर बदलाव की राजनीति ही न इससे पलट जाए। यह उनके स्वार्थ को साध्य नहीं करती इसलिए वीर सावरकर को अछूत बना दिया है। इसमें राजनीतिक नेतृत्व और संगठन दोनों ही सम्मिलित हैं। चुनावों के पहले एक चर्चा शुरू होती है कि वीर सावरकर को भारत रत्न मिले लेकिन चुनावों की पूर्णता के साथ वह मद्धम पड़ जाती है। यह स्वार्थ पारायणता है ऐसे लोगों की।

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उत्तराखण्ड गया हाथ से
उत्तराखण्ड हमारे हाथ से जा चुका है। वहां तो गठन के बाद से एकाध बार छोड़कर एक ही दल की सरकार थी। मुख्यमंत्री बदलता है लेकिन राज नहीं बदलता। एक ईसाई से पैसे लेता है तो दूसरा मुस्लिम से पैसे लेता है।

बंगाल भी कश्मीर पार्ट टू है
कश्मीर के नरसंहार और बंगाल की हिंसा में बड़ी साम्यता है। कश्मीर में तैयारी के साथ नरसंहार किया गया। वहां मौलवी, कुरान, आतंक सबका इस्तेमाल किया गया, जो दुनिया का सबसे बड़ा नरसंहार था। बंगाल में 16 अगस्त 1946 को हुसैन सैयद सोराब वर्दी नामक संयुक्त बंगाल का मुख्यमंत्री था। वह मुस्लिम लीग का था। वहां हजारों हिंदुओं को मारा गया, 16 अगस्त, 1946 को रमजान चल रहा था, इस बार 2 मई 2021 को भी रमजान चल रहा था। ये मक्कार वहाबी मुस्लिम जब अपने प्रोफेट महोम्मद के नहीं हुए, उनकी बेटी, दामाद के कातिल बन गए तो दूसरे के क्या होंगे।

ऐसा ही शौक ए शहादत हमास के आतंकवादियों में भी चर्राया तो उन्होंने इजरायल पर हमला कर दिया। लेकिन वो भारत नहीं है कि सत्तर साल में गांव खाली करा लिए जाए। ये यहां सबको खरीद लेते हैं, ये बिकाऊ लोग हैं जल्दी बिकते हैं।

जाति को संविधान ने बलवान बनाया
वीर सावरकर के हिंदुत्व की अपनी आवश्यकता के अनुसार व्याख्या की गई। जबकि उनकी नीति जाति को लेकर बड़ी स्पष्ट थी, वे कहते थे कि व्यक्ति की जाति जन्म से नहीं कर्म से निर्धारित होती है। वीर सावरकर ने कभी जाति और वर्ण के आधार पर वर्गीकरण नहीं किया। इसके उलट जाति को भारत के संविधान ने अधिक बढ़ावा दिया, पटना के अधिकतर मदिरों के पुजारी दलित हैं , लेकिन इसकी कभी चर्चा नहीं होती क्योंकि इससे राजनीतिक लाभ नहीं है।

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आरक्षण ने हिंदू समाज को तोड़ा
आरक्षण के निर्मूलन का कार्य अब होना चाहिए। इसे आर्थिक आधार पर कर देना चाहिए। डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर ने इसे दस वर्ष के लिए बनाया था, लेकिन राजनीति के लिए लोगों ने इसे कभी खत्म करने की कोशिश नहीं की। इसने हिंदू समाज की मार्शल रेस जो थीं उसे तोड़ा। भारतीय समाज को कमजोर करके आरक्षण दिया गया, इसके माध्यम से हिंदू परिवारों को तोड़ा गया, हिंदुओं को बांटा गया। मराठा, जाट, दलित, ओबीसी का रिजर्वेशन हटना चाहिए और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को मिलना चाहिए। जब तक वोट बैंक की राजनीति चलती रहेगी यही चलता रहेगा।

सावरकर ने उसी काल में कर ली थी व्याख्या
वर्ष 1939 के हिंदू महासभा के 21 वें अधिवेशन में वीर सावरकर ने कहा था कि भारत का मुसलमान अपने आपको देश के बाहर के मुसलमानों के प्रति अधिक वफादार मानता है, बनिस्बत अपने हिंदू पड़ोसी के। ये वैसे ही है जैसे जर्मनी में रहनेवाला यहूदी करता है।

सावरकर ने अपनी किताब मे इजरायल का उल्लेख किया था। जो देश आज कर रहा है इजरायल से संबंधों पर उसे वीर सावरकर ने इसी काल में उल्लेखित किया है अपनी किताब में। राष्ट्रवादियों को यह ध्यान रखना
चाहिये कि इजरायल इसलिए बना क्योंकि उनके यहां एक-एक बच्चा इजरायल के लिए जीता है और इजरायल के लिए मरता है।

पहले खुद इजरायलियों जैसे नागरिक बनो
पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ कहते हैं यदि आपको इजरायल के प्रधानमंत्री जैसा बोलनेवाला प्रधानमंत्री चाहिए तो आपको भी इजरायल के नागरिकों जैसे बनना पड़ेगा। वे राष्ट्र को लेकर एक हैं, देश को सरकार चलाती है लेकिन राष्ट्र को वहां के नागरिक चलाते हैं।

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राजनीति में पूर्वजों की तिलांजलि
जिस इंदिरा गांधी ने वीर सावरकर के विचारों को अपनाया, उनकी प्रशंसा में पत्र लिखे, जिस कांग्रेस के प्रधानमंत्री रहे नरसिम्हा राव ने वीर सावरकर का पुरस्कार किया उसी पार्टी के और परिवार के लोग अब अपने पूर्वजों के विचारों से भटक गए हैं।

वर्तमान वीर सावरकर को आत्मसात करने को खड़ा है
भारत का वर्तमान वीर सावरकर के जीवन मंत्र को स्वीकार करने को तैयार खड़ा है, हमें ऐसे यथार्थ को वीर सावरकर के ग्रंथों के ज्ञान से भरना चाहिए। इसके लिए इस पीढ़ी को भी 1857 का पहला स्वातंत्र्य समर, हिंदुत्व समेत वीर सावरकर द्वारा सौंपी गई ग्रंथों की बड़ी विरासत को पढ़ना होगा। अपने विचारों में अपनाना होगा।

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…तो आपको कीचड़ में डुबो देंगे
वीर सावरकर पर निराधार टिप्पणियां करनेवालों पर स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक ने बहुत योग्य निर्णय लिया है। जिसके फलस्वरूप ‘एबीपी माझा’ जैसे समाचार माध्यम को क्षमा याचना करनी पड़ा और अब मलयाली मनोरमा समूह की पत्रिका ‘द वीक’ भी माफी मांग रही है।

अब तक लोग समझते थे कि वीर सावरकर पर कीचड़ उछालकर हम अपना ध्येय साध्य करते रहेंगे, लेकिन ऐसे लोगों के लिए चेतावनी है कि आज का समाज इस कीचड़ उछालने के आपके प्रयत्न को स्वीकार नहीं करेगा बल्कि वह आपको उसी कीचड़ में डुबो देगा।

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हिंदू महासभा का वह स्थान सरकार लें
दिल्ली में हिंदू महासभा का कार्यालय है। जिसकी परिस्थिति अब दयनीय है। वहां का संचालन करनेवाले मार्ग से भ्रमित हैं, वहां वीर सावरकर की शिक्षा और हिंदू महासभा के समाज कार्य नहीं होते बल्कि वहां विवाह और पार्टियों के मंडप सजने लगे हैं। उस पर स्वार्थियों का कब्जा हो गया है। इसे सरकार को अधिग्रहित करना चाहिए और उसे स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक को देकर उसका संचालन करवाना चाहिए।

हमारी दृष्ट छोटी है
हमारी समस्या ये है कि हमें मलेरकोटला में तुष्टीकरण दिखता है। लेकिन यूपीएससी में क्या हो रहा है, निकिता तोमर के साथ क्या हुआ, रिंकू शर्मा के साथ क्या हुआ। इन सबमें सरकार के स्वार्थ में भी सम्मिलित हैं।

मलेरकोटला की एक कहानी है, जब लोग वहां से पाकिस्तान स्थानांतरित हो रहे थे तो वहां कुछ पंडित जी आए। उस समय वहां जिन्ना भी मौजूद थे, उन्होंने कहा इन लोगों को रोकिये, यदि ये लोग चले जाएंगे तो हमारे बैलों को नाल कौन लगाएगा।

वीर सावरकर को परेशान किया गया
28 फरवरी, 1966 में वीर सावरकर ने आत्मार्पण किया था। लेकिन उनसे सत्ता डरती थी कि कहीं उनके विचार बाहर न आ पाएं। इसके लिए कपूर कमीशन बनाया गया। जिससे की उन्हें परेशान किया जा सके। लोगों को उसके विषय में पता नहीं है। इसकी जानकारी के लिए शोध करना चाहिए तब पता चलेगा कैसे गांधी जी की हत्या हुई, कैसे तीन पहले ही पता था इसके विषय में।

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तो उस किताब और उसके माननेवालों के लिए जगह नहीं
सनातनी अपनी मूल पहचान की ओर लौट रहे हैं, जिस झूठे इतिहास को इरफान हबीब और रोमिला थापर जैसे मक्कारों ने पढ़ाया था, आज लोग उससे बाहर आ रहे हैं। ये जो चेतना है उसके कारण ये जो गद्दार मुसलमान बड़ी संख्या में है, वो इसी कोशिश में है कि ये हिंदू उसी नींद में सोए रहें, जिसमें हिंदू मुस्लिम भाई-भाई, सारे धर्म एक हैं, मजबह नहीं सिखाता, जैसी बातें फैलाई जाती रहें और यह बतातें रहें कि जब तक ये मानते रहेंगे तब तक इस देश में शांति रहेगी। यह समय है जब नब्बे से सौ करोड़ हिंदुओं को अपनी आवाज उठानी चाहिए। अपनी बात को तथ्य और तर्कों से साथ रखना चाहिए। ये वो देश है जहां हर व्यक्ति को गांधी पर बोलने की इजाजत है, सीता पर बोलने की इजाजात है, तो फिर कोई किताब क्या कहती है उससे हमें रुचि नहीं है। यदि वह किताब हमारे देश के लिए खतरनाक है तो उस किताब पर सवाल उठेगा और उसके माननेवालों पर भी सवाल उठेगा और यदि कोई कहेगा कि वो किताब संविधान से ऊपर है तो फिर आपका भारत में कोई स्थान नहीं है। इसलिए सीएए, किसान आंदोलन, बंगाल उन्हीं सामूहिक शक्तियों का काम है। जिससे की सब बिखरे रहें। 1947 के बाद अब भारत के युवा की चेतना लौटी है, यही इन ताकतों की बीमारी है।

मुसलमानों की आस्थाएं फिलस्तीन के साथ
आज भारत का मुसलमान दुनिया के सबसे दुर्दांत हमास और जैश ए मोहम्मद और लश्कर ए तोयबा जैसे संगठन के साथ हैं। ये संगठन कुरान के अनुसार बनाए गए हैं और कुरान की सही व्याख्या बताते हैं, चाहे वो बगदादी हो या आईएसआई हो। ये तमाम लोग भारत में रहते हैं लेकिन इनकी आस्थाएं तुर्की, फिलिस्तीन, पाकिस्तान के साथ हैं। इनसे कहना चाहिए कि यदि फिलिस्तीन के लिए तुम्हारी जान जा रही है तो जाते क्यों नहीं यहां से।

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स्वातंत्र्यवीर को नमन
वीर सावरकर के अनुयायी हरिंद्र श्रीवास्तव ने किताब लिखी थी। जिसका शीर्षक है ‘सावरकर पर थोपे गए चार अभियोग’, उन्होंने एक कविता भी लिखी है। हरिंद्र जी के पिताजी हिंदु महासभा के अध्यक्ष थे।

जिंदगी किस तरह बिताता हूं, बैठिये आपको बताता हूं।
ठंडे लोगों से मुझको नफरत है , आग पीता हूं आग खाता हूं।।
चारो धामों से हूं अभी वंचित, अंदमान पांच बार हो आया हूं।
हां मगर मैं कोई जगह ऐसी नहीं देखी जहां गूंजा था वंदेमातरम का स्वर।
कोड़े बरसे थे नंगी पीठों पर, सिर कटे थे जहां वीरों के।
गोलियां छातियों पर खाई थीं, बस वहां रुक जाता जाता हूं।।
पूरा माथा वहां झुकाता हूं, चार आंसू भी बहा आता हूं।
वहां की मिट्टी भी उठा लाता हूं, उसको माथे पर भी सजाता हूं।।
फिर रात को कभी सन्नाटे में कलम को डालकर कलेजे में जो भी लावा सा फूटपड़ता है।
वही लिखता हूं, वही गाता हूं, आप तक बस यही पहुंचाता हूं।।
आप बुलाते हैं चला आता हूं, जिस दिन जीवन से निपट जाउंगा।
आग की बाहों में सिमट जाउंगा, आग हूं आग में मिल जाउंगा।
चांद तारों में न खोजना मुझे, मैं तो सूरज में नजर आउंगा।
तब तलक यूं ही जिये जाउंगा, आग पीता हूं आग खाता हूं।।

हरिंद्र श्रीवास्तव

 

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