शिवसेना से पहले इन दलों में भी हो चुका है विद्रोह

राजनीति में परिस्थितियां कब करवट ले लेती हैं, यह अच्छे-अच्छे राजनीतिज्ञों की समझ में भी नहीं आता। जिस दल की निष्ठा पिछले 56 वर्षों में एक परिवार के प्रति थी उसमें ऐसा असंतोष उपजा है कि, पार्टी किसके हाथ होगी इसको लेकर प्रश्न खड़े हो गए हैं।

महाराष्ट्र में 56 वर्ष की शिवसेना पार्टी सबसे बड़ी फूट का सामना कर रही है। लेकिन, यह कोई पहला विद्रोह नहीं है, देश में इसके पहले भी कई पार्टियों में विद्रोह हुआ और दिग्गज नेताओं को अपनी ही पार्टी से बाहर का रास्ता देखना पड़ा।

शिवसेना के निष्ठावानों ने ही छोड़ा साथ
शिवसेना ने अपने प्रबल विरोधी कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से हाथ मिलाकर सत्ता प्राप्त कर ली। परंतु, सत्ता के इस मद में उसके निष्ठावानों का कद छोटा होता गया। यह ढाई वर्ष तक चला, राज्यसभा के लिए पार्टी ने एकजुटता से अपने उम्मीदवार को विजय दिलाई, परंतु, मत संख्या ने एक बात स्पष्ट कर दी थी कि, पार्टी में सबकुछ ठीक नहीं हैं। इसके दस दिन बाद ही विधान परिषद के चुनाव हुए, पार्टी के दोनों उम्मीदवार विजयी हुए। सूत्रों की मानें तो विधान परिषद मतदान के दिन कैबिनेट मंत्री एकनाथ शिंदे को ऐसे व्यवहार का सामना करना पड़ा, जिसने ढाई वर्षों से सत्ता में रहकर मिल रही उपेक्षा के भाव को उग्र कर दिया। इसकी परिणति हुई कि, शिवसेना के 35 और उनके साथ निर्दलीय विधायकों ने गुजरात और बाद में गुवाहाटी की शरण ले ली और वहां से शिवसेना कार्याध्यक्ष उद्धव ठाकरे के विरुद्ध विरोध का बिगुल फूंक दिया।

वैसे, शिवसेना में इसके पहले भी असंतोष उपजता रहा है, जिसकी पहली लौ 1974 में बंडू शिंगरे ने जलाई, इसके बाद 1991 में छगन भुजबल, नवी मुंबई के गणेश नाईक, 2005 में नारायण राणे और 2005 में ही राज ठाकरे भी असंतोष के कारण शिवसेना से अलग हो गए थे।

वर्तमान परिस्थिति यह है कि, शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे की पार्टी में उनके पुत्र मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और पौत्र आदित्य ठाकरे की सरकार अल्पमत में आ गई है। असंतुष्ट बहुसंख्य विधायक अब बालासाहेब ठाकरे की हिंदुवादी विचारधारा को लागू करने के लिए राजनीति करना चाहते हैं। जिसमें कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस की भूमिका न हो। जबकि, अपनी ही पार्टी में छोटे ठाकरे दरकिनार हो गए हैं।

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अपनी ही पार्टी बाहर ये बाहर हो गए एन.टी रामाराव
चंद्राबाबू नायडू के ससुर और तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के संस्थापक नंदमूरि तारक रामाराव 70 साल के थे, जब उनसे 38 साल की लक्ष्मी पार्वती ने विवाह किया था। यह बात उनके 7 बेटों और 3 बेटियों को पसंद नहीं आई। जब एनटीआर को लकवा मार गया तो वे अपनी पत्नी पर निर्भर हो गए। ऐसे में पारंपरिक सीट ‘तेकाली’ खाली हो गई थी, जहां से लक्ष्मी पार्वती चुनाव लड़ना चहती थीं, इस सीट पर रामाराव के बेटे हरिकृष्णा ने भी अपना दावा ठोंक दिया। बस यहीं से परिवार का विवाद जगजाहिर होने लगा। आखिरकार एनटीआर ने तीसरे को खड़ा करके विवाद को उस समय के लिए विराम दे दिया। लेकिन जैसे-जैसे लक्ष्मी का पार्टी में दखल देना शुरू हुआ, उनको ‘अम्मा’ कहनेवाले पार्टी के विधायक और सांसद भी उनके ही खिलाफ खड़े हो गए। जहां एक ओर रामाराव हमेशा अपनी पत्नी लक्ष्मी पार्वती के साथ खड़े रहते थे, वहीं उनके बेटे, बेटी और दामाद ने बगावत कर दी। इस बगावत की अगुआई की थी चंद्रबाबू नायडू ने, जो उस दौरान रामाराव सरकार में मंत्री थे। जिस एनटी रामाराव ने टीडीपी को खड़ा किया था, चंद्रबाबू नायडू ने न सिर्फ उन्हें सरकार के प्रमुख के तौर पर बेदखल कर दिया, बल्कि पार्टी से भी निकाल दिया। आखिरकार एनटी रामाराव ने अपने परिवार से सार्वजनिक रूप से सारे संबंध तोड़ लिए और चंद्रबाबू नायडू को ‘पीठ में छुरा घोंपने वाला धोखेबाज’ और ‘औरंगजेब’ कहने लगे।

चंद्राबाबू ने ससुर हरिकृष्णा को भी किया दरकिनार
बात 2011 की है, जब तेलुगू देशम पार्टी के संस्थापक एन.टी.रामाराव के पुत्र नंदमूरी हरिकृष्णा और उनके दामाद व पार्टी अध्यक्ष चंद्र बाबू नायडू के बीच उत्तराधिकार को लेकर टकराहट हो गई। एक कार्यक्रम रखा गया था, एनटी रामाराव को श्रद्धांजलि देने का। जिसमें चंद्रबाबू नायडू ने अपने बेटे लोकेश नायडू को उत्तराधिकारी के रूप में बढ़ावा देने का प्रयास किया तो एनटी रामाराव के बड़े बेटे नंदमूरी हरिकृष्णा ने इसका जमकर विरोध किया। टीडीपी पोलित ब्यूरो के सदस्य हरिकृष्णा चाहते थे कि उनके बेटे जूनियर एनटीआर पार्टी की कमान संभालें। लेकिन तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) के अध्यक्ष चंद्र बाबू नायडू को ये स्वीकार नहीं था। जिसके बाद एनटीआर परिवार में विद्रोह एक बार फिर फूट पड़ा। इस बार चंद्राबाबू नायडू ने पार्टी को पूरी तरह से अपने कब्जे में ले लिया।

करुणानिधि ने किया डीएमके पर कब्जा
एम.जी रामचंद्रन 1953 तक कांग्रेस में रहे और करुणानिधि की मदद से 1953 में ही द्रविड मुनेत्रा कझगम (डीएमके) से जुड़े। अभिनेता और नेता की छवि राज्य में सफलता की सीढ़ी पर दिनोंदिन चढ़ रही थी। इस बीच एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) का रुतबा पार्टी में तेजी से बढ़ रहा था। जिससे करुणानिधि को दिक्कत होने लगी। डीएमके के संस्थापक अण्णा दुराई के निधन के बाद करुणानिधि और एमजीआर में कड़वाहट खुलकर सामने आ गई। इस कड़वाहट के बीच 1972 में करुणानिधि ने अपने पुत्र एमके मुथु को राजनीति में आगे करना शुरू किया तो दूसरी तरफ एमजी रामचंद्रन ने अपनी सह-अभिनेत्री जयललिता को आगे किया। इसने रिश्ते को बिगाड़ दिया और एम.करुणानिधि ने एमजीआर को पार्टी से निकाल दिया।

एमजीआर की पत्नी को जयललिता ने बाहर किया
1972 में एमजीआर ने एआइएडीएमके का गठन किया। पार्टी को तमिलनाडु में अच्छा समर्थन मिला और एमजीआर 1977 से लेकर 1987 तक मुख्यमंत्री रहे। इस बीच एमजीआर की पत्नी पार्टी में जयललिता के बढ़ते कद से परेशान थीं। जिसकी परिणति रही कि 1985 में एमजीआर की पत्नी जानकी ने एमजीआर के करीबी थिरुनवुकारासु की सहायता से जयललिता को पार्टी से निकाल दिया। एआइएडीएमके दो धड़ों में बंट गई। जयललिता का धड़ा मजबूत था, इसलिए उसने एमजीआर के निधन के बाद एआईएडीएमके नियंत्रण में ले लिया।

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