बंगाल चुनाव और बांग्लादेश यात्रा, क्या साधने में लगे हैं पीएम?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बांग्लादेश यात्रा ऐसे समय हो रही है जब पश्चिम बंगाल में चुनाव हैं। लगभग 16 महीने बाद प्रधानमंत्री किसी देश की यात्रा पर जा रहे हैं। अपनी बांग्लादेश यात्रा में प्रधानमंत्री मतुआ संस्थापक की जन्मस्थली का दौरा भी कर सकते हैं।

पश्चिम बंगाल में चुनावी राजनीति तेजी से नित नए करवट ले रही है। तृणमूल कांग्रेस अपनी ‘ममता’ से मतदाताओं को भिगोकर रखना चाहती है। इसके लिये मुख्यमंत्री ममता बनर्जी दिन-रात जनसंपर्क से जनसमर्थन जुटाने के प्रयत्न में हैं। उनके साथ पूरा विपक्ष खड़ा है। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी अगली सरकार की अपनी लाने के लिए कोई प्रयत्न नहीं छोड़ रही है। इस चुनाव प्रचार में भी सफलता की सीढ़ी लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सम्मलिति होंगे। जिसकी परिपाटी भी लिखी जा चुकी है। प्रधानमंत्री बंगाल के चुनावों के लिए बांग्लादेश जाकर समर्थन जुटाएंगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 26 और 27 मार्च को बांग्लादेश की दो दिवसीय यात्रा पर जाएंगे। वे वहां बांग्लादेश की स्वतंत्रता के 50 वर्ष होने की वर्षगांठ कार्यक्रम में सम्मिलित होंगे। यह भारत और बांग्लादेश की यात्रा के 50 वर्षों की वर्षगांठ भी है। प्रधानमंत्री 16 महीने बाद विदेश यात्रा पर जा रहे हैं। इसके पहले वे 13 से 15 नवंबर 2019 को ब्राजील दौरे पर गए थे।
प्रधानमंत्री की यह यात्रा बांग्लादेश के साथ भारत के संबंधों को 360 डिग्री तक ले जाने की कवायद कही जा रही है।

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इसका दूसरा पहलू है कि बांग्लादेश की यात्रा से बंगाल के चुनावों में प्रधानमंत्री मोदी सीधा कनेक्ट हो सकते हैं। यह समुदाय पूर्वी पाकिस्तान से बंगाल में स्थानांतरित हुआ है। प्रधानमंत्री बांग्लादेश में मतुआ समुदाय के धर्मगुरु हरिचांद ठाकुर की जन्मस्थली तथा मतुआ समुदाय की तीर्थस्थली गोपालगंज के उड़ाकांदी जाकर दर्शन भी करेंगे। इसके अलावा बरिशाल के शिकारपुर में स्थित सुगंध सती पीठ, कुस्ठिया के सिलाईदह में रविंद्रनाथ ठाकुर की कुठीबाड़ी और बाघाजतिन की बसतबाड़ी जा सकते हैं।

बंगाल में मतुआ मतदाताओं का महत्व
पश्चिम बंगाल में मतुआ समुदाय के मतदाता लगभग एक करोड़ अस्सी लाख हैं। जबकि बंगाल के लगभग तीन करोड़ मतादातओं का साथ इस समुदाय के पास है। इस समुदाय की कुल जनसंख्या में हिस्सेदारी 17 प्रतिशत है। ये वर्षों से भारत में रहते हैं। इन्हें मतदान का अधिकार तो मिल गया लेकिन इन्हें अभी भारतीय नागरिकता नहीं मिल पाई है।
ये समुदाय जिसका समर्थन करता है उसकी सत्ता निश्चित मानी जाती है। 1977 से यह समुदाय मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का समर्थन करता रहा है। लेकिन 15 मार्च 2010 को बीनापनी देवी यानी बोडो मां ने ममता बनर्जी को मतुआ समुदाय का संरक्षक घोषित कर दिया था। जिसके बाद 2011 में ममता बनर्जी ने वाम दलों की सरकार को उखाड़कर फेंक दिया और सत्ता में आ गई।

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इतनी सीटों पर सीधा प्रभाव
मतुआ समुदाय के मतदाताओं का पश्चिम बंगाल के उत्तरी क्षेत्र में अधिक है। 294 विधायकों वाली विधान सभा में सत्तर सीटों पर मतुआ समुदाय का प्रत्यक्ष प्रभाव रखता है।

भाजपा को सीएए का साथ
भारतीय जनता पार्टी के पास सिटिजन अमेंडमेंट ऐक्ट यानी संशोधित नागरिकता कानून का एक ऐसा अस्त्र है जिसका प्रभाव मतुआ समुदाय पर सीधे प्रभाव छोड़ रहा है। इस समुदाय के 90 प्रतिशत लोग हिंदू समाज के हैं। ऐसे में इन्हें संशोधित नागरिकता कानून से नागरिकता मिलने की प्रबल आशा है। भारतीय जानता पार्टी अपने प्रचार में इसका उपयोग भी कर रही है। 2019 के लोकसभा चुनावों मे भारतीय जनता पार्टी ने मतुआ समुदाय का समर्थन लेकर चुनाव प्रचार किया था। जिसका परिणामों मे असर दिखा। इस चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीनापनी देवी का आशीर्वाद लिया था।

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