देश के बाल क्रांतिवीरों को सम्मान… वह मांग हुई पूरी

देश की स्वतंत्रता के लिए किशोर वय में ही रगों का उबाल कई स्थानों पर दिखने लगा था। इसका परिणाम हुआ कि अंग्रेजों को भारत के बाल क्रांतिकारियों से भी डर लगने लगा था।

देश की स्वतंत्रता में बाल क्रांतिकारियों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके कार्यों के स्मरण में भाजपा सासंद ने एक राष्ट्रीय संग्रहालय और मोनोग्राम प्रकाशित करने की मांग की थी। इस मांग को केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने स्वीकार कर लिया है।

राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा ने 23 मार्च 2021 को मांग रखी थी कि, स्वतंत्रता आंदोलन में सभी आयु वर्ग के लोगों ने सहभाग लिया था, इसमें किशोर वयीन क्रांतिकारी भी थे। आजादी का अमृत महोत्सव के अंतर्गत इन बाल क्रांतिवीरों के सम्मान में राष्ट्रीय संग्रहालय और मोनोग्राम विकसित करना चाहिये। इसके लिए राकेश सिन्हा ने प्रकाशन विभाग राष्ट्रीय अभिलेखागार और नेशनल बुक ट्रस्ट से परस्पर समन्वय के साथ इन बाल हुतात्माओं पर मोनोग्राम प्रकाशित करने की मांग भी की है।

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ये थे हौतात्म स्वीकार करनेवाले बाल क्रांतिकारी
11 अगस्त, 1942 को पटना सचिवालय में तिरंगा झंडा फहरानेवाले दल के सदस्यों में नाबालिग सदस्य भी थे। इसमें उमाकांत सिन्हा, रामानंद सिंह रामगोविंद, देवीपद आदि नौवीं के छात्र थे, जबकि राजेंद्र और सतीश झा दसवीं के छात्र थे। उड़ीसा के बाजी रावत ने 12 वर्ष की आयु में हौतात्म स्वीकार किया था। असम के तिलेश्वरी बरुआ ने मात्र 12 वर्ष की आयु में वीरगति स्वीकारी थी। कनकलता बरुआ 17 वर्ष की आयु में, खुदीराम बोस 18 वर्ष की आयु में अपने प्राण स्वतंत्रता के लिए अर्पित किये थे।

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