जानें वो दस घोटाले… जिनसे झुलस चुका है महाराष्ट्र!

महाराष्ट्र में भ्रष्टाचार के आरोप हर सरकार के काल में लगते रहे हैं। लेकिन महाविकास आघाड़ी सरकार के काल में लगे आरोपों ने जितना गली से लेकर दिल्ली को गरमाया उतना निकट भविष्य में बहुत कम ही देखने को मिला है।

महाराष्ट्र सरकार पर पड़ा लेटर बम भ्रष्टाचार का पहला मामला नहीं है जिससे राजनीति झुलस रही है। इसके भी पहले यहां भ्रष्टाचार के आरोप लगे और पद पर बैठे मंत्रियों को त्यागपत्र देना पड़ा। इन प्रकरणों को एक-एक करके हम आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।

लेटर बम –
राज्य में उद्योगपति मुकेश अंबानी के घर के पास विस्फोटक लदी एसयूवी मिलने के बाद यह प्रकरण ऐसा उलझता गया कि इसमें आयुक्त का पद चला गया, एक अधिकारी का निलंबन हो गया और गृह मंत्री का विकेट ही गिर गया। इसमें समय लगा मात्र 39 दिनों का।

  • 26 फरवरी, 2021 को उद्योगपति मुकेश अंबानी के घर के बाहर विस्फोटक लदी एसयूवी बरामद हुई थी।
  • 5 मार्च 2021 को एसयूवी के मालिक मनसुख हिरेन का शव मुंब्रा खाड़ी में मिला
  • 15 मार्च, 2021 को एपीआई सचिन वाझे को निलंबित किया गया
  • 17 मार्च, 2021 को मुंबई पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह को पद से हटाया गया
  • 20 मार्च, 2021 परमबीर सिंह का लेटर बम सामने आया, इसमें उन्होंने दावा किया किया गृह मंत्री अनिल देशमुख ने सहायक पुलिस निरिक्षक सचिन वाझे के समक्ष हर माह 100 करोड़ रुपए की वसूली का लक्ष्य रखा था।
  • 22 मार्च, 2021 को परमबीर सिंह ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष इस प्रकरण की जांच सीबीआई से कराने की मांग की। सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें उच्च न्यायालय जाने का आदेश दिया।
  • 5 अप्रैल, 2021 को बॉम्बे उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि परमबीर सिंह के आरोपों की अंतरिम जांच सीबीआई करेगी। इसके बाद गृह मंत्री अनिल देशमुख ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया।

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अंतुले ट्रस्ट घोटाला-
यह घोटाला अस्सी के दशक का बड़ा घोटाला था। जिसमें बॉम्बे हाइकोर्ट ने एआर अंतुले को दोषी करार दिया था। अंतुले पर इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान के लिए बिल्डरों से तीस करोड़ रुपए की धन उगाही का आरोप था। ये ट्रस्ट अंतुले द्वारा स्थापित और संचालित विभिन्न ट्रस्ट में से एक था। इस धन उगाही के बदले में बिल्डरों को कोटा से अधिक सीमेंट दिलवाना शामिल था। 13 जनवरी, 1982 को बॉम्बे उच्च न्यायालय ने अंतुले को दोषी करार दिया था जिसके कारण उन्हें मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देना पड़ा।

चर्मकार घोटाला –
यह राज्य में हुए महाघोटालों में से एक है। इसमें सरकार को लगभग 1200 करोड़ रुपए की चपत लगी थी। यह घोटाला 1995 में सामने आया था। जिसमें गरीब चर्मकारों को निम्न दरों पर ऋण उपलब्ध कराना था। लेकिन इसमें राजनीतिक और व्यवसाइयों ने गरीबों के नाम से सोसायटी का गठन करके 12 सौ करोड़ रुपए का गबन कर लिया।
इसमें जो लोग गिरफ्तार हुए थे उनमें मुंबई के पूर्व शेरिफ का बेटा सोहिन दाया (दाऊद शूज़) मुख्य अभियुक्त था। इसके अलावा मेट्रो शूज़ का रफीक तेजानी, मिलानो शूज़ का किशोर सिग्नापुरकर शामिल भी शामिल थे।

तेलगी स्टैंप पेपर घोटाला –
इस घोटाले से देश के 12 राज्य प्रभावित हुए थे। जो लगभग बीस हजार करोड़ रुपए का था। वर्ष 1992 से 2022 के बीच लगभग 12 प्रकरण महाराष्ट्र और 15 प्रकरण दूसरे राज्यों में अब्दुल करीम तेलगी के विरुद्ध दर्ज हुए थे। ये घोटाला 90 के दशक में सामने आया था। इसके लिए विशेष जांच दल का गठन करके उसे जांच का जिम्मा दिया गया था।

महाराष्ट्र शिक्षा घोटाला –
यह लगभग 120 करोड़ रुपए का घोटाला था। जिसमें सरकारी स्कूलों में फर्जी छात्रों की संख्या बताकर सरकार को 120 करोड़ रुपए का नुकसान पहुंचाया गया था। राज्य सरकार के सर्वेक्षण के अनुसार राज्य के 3,500 स्कूलों के कुल सात लाख छात्रों में से 1.4 लाख छात्रों फर्जी पाए गए थे। यह सर्वेक्षण शुरू में नांदेड में किया गया था लेकिन बाद में राज्यस्तरीय सर्वेक्षण किया गया।

सिंचाई घोटाला –
सिंचाई घोटाला महाराष्ट्र सरकार के अधीन हुआ सबसे बड़ा घोटाला था। जिसमें 35 हजार करोड़ रुपए की अनियमितता शामिल है। यह वर्ष 1999 से 2009 के बीच हुआ था। इसे विदर्भ सिंचाई विकास संस्थान के चीफ इंजीनियर विजय पांढारे ने उजागर किया था। 2012 के आर्थिक सर्वेक्षण में यह बताया गया था कि सिंचाई की क्षमता पिछले दस वर्षों में मात्र 0.1 प्रतिशत बढ़ी है जबकि, उस पर 70 हजार करोड़ रुपए खर्च किया गया था।
इस प्रकरण में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अजीत पवार निशाने पर आ गए थे। इसके कारण 2012 में अजीत पवार को मंत्री पद से त्यागपत्र देना पड़ा।

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चारा घोटाला-
यह घोटाला 2012-13 के बीच अहमदनगर जिले में सामने आया था। इसे एक सामाजिक कार्यकर्ता अनिल शर्मा ने जनहित याचिका के माध्यम से उजागर किया था। जिसमें सूखाग्रस्त क्षेत्रों में जानवरों की चारा छावनी बनाने के लिए सरकार ने 389 करोड़ रुपए खर्च किये थे। जिसमें से 289 करोड़ रुपए जनवरों की संख्या बढ़ाकर हजम कर लिये गए। इस पर 2013 में बॉम्बे उच्च न्यायालय की औरंगाबाद खंडपीठ ने एफआईआर दायर करने का आदेश दिया था।

आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाला-
इस सोसायटी के गठन को लेकर बड़ा घोटाला सामने आया था। जिसमें कारगिल के हुतात्माओं और सैनिकों की विधवा के लिए छह मंजिला इमारत बनाई जानी थी। जिसकी जगह 31 मंजिला इमारत खड़ी कर दी गई। इसमें नेता, अधिकरियों और सेना के वरिष्ठ अधिकारियों को फ्लैट दिये गए थे। 2011 में इस प्रकरण की जांच के लिए महाराष्ट्र सरकार ने दो सदस्यीय कमेटी का गठन किया था। इस प्रकरण में प्रदेश के चार मुख्यमंत्रियों की सहभागिता का आरोप लगा था। यह प्रकरण इतना सुर्खियों में आया था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ गया। हालांकि बाद में उन्हें क्लीन चिट मिल गई।

चाय घोटाला –
भारतीय जनता पार्टी के शासन में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के कार्यकाल में मुख्यमंत्री कार्यालय प्रतिदिन 18,500 रुपए की चाय पीता था। सूचना अधिकार के अंतर्गत मिली जानकारी के अनुसार जो खर्च किया गया था उसे देखते हुए प्रतिदिन मुख्यमंत्री कार्यालय में 9,000 आगंतुकों के आने का अंदेशा होता है जबकि पूरे मंत्रालय में 5,000 से अधिक आगंतुक नहीं आते हैं।

चूहा घोटाला –
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के कार्यकाल में ही चूहा घोटाला सामने आया था। जिसमें चूहा मारने का ठेका लेनेवाली कंपनी एक सप्ताह में ही 3,19,400 चूहे मार दिये। इस प्रकरण को तत्कालीन भाजपा नेता एकनाथ खडसे ने उठाया था। एकनाथ खडसे ने इसके माध्यम से सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग को निशाना बनाया था। उन्होंने कहा कि मुंबई मनपा एक वर्ष में 6 लाख चूहे मारती है। इसलिए इसकी जांच होनी चाहिए। उस समय सामान्य प्रशासन विभाग मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के पास था। जबकि, पुणे के भूखंड मामले में घोटाले का आरोप लगने के बाद त्यागपत्र दे चुके एकनाथ खडसे की इस प्रकरण के बाद से ही फडणवीस से पटरी नहीं खाती थी। इसलिए माना जा रहा था कि एकनाथ खडसे ने इस आरोप के माध्यम से फडणवीस पर निशाना साधा था।

 

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