मुगल आक्रांता औरंगजेब की क्रूरता और साहिबजादों के सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक है ‘वीर बाल दिवस’

सिख धर्म समेत राष्ट्र ने दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी के वीर पुत्रों को उनकी वीरता और बलिदान के लिए याद किया। इन चार सपूतों को खालसा योद्धा के के रूप पहचाना जाता है।

Guru Gobind Singh Sahibjade

राष्ट्र ने सोमवार को प्रथम वीर बाल दिवस मनाया। इस अवसर पर एक विशेष कार्यक्रम नई दिल्ली के मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में आयोजित किया गया था। जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सम्मिलित हुए। उन्होंने, इस अवसर पर सिखों के दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी के परिवार के बलिदान का स्मरण किया। प्रधानमंत्री ने 9 वर्ष और 6 वर्ष के साहिबजादों का स्मरण भी किया और नई पीढ़ी के लिए वीर बाल दिवस को बड़ी प्रेरणा बताया। इन साहिबजादों को मुगल आक्रांता औरंगजेब के आदेशों से मृत्यु दंड दे दिया गया था।

योद्धा राजकुमार थे गुरु गोबिंद सिंह के पुत्र
बता दें कि, सिखों के दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी के चार पुत्र थे। जिन्हें सिख खालसा के योद्धा राजकुमार कहा जाता है। ये चार योद्धा राजकुमारों में साहिबजादा अजीत सिंह, साहिबजादा जुझार सिंह, साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह थे। गुरु गोबिंद सिंह के चारों पुत्रों को खालसा में दीक्षा दी गई थी और सभी को 19 वर्ष की आयु से पहले ही मुगल सेना द्वारा मृत्यु दंड दे दिया गया था।

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मुगलों से लड़कर वीरगति को प्राप्त
अजीत सिंह 18 वर्ष की आयु में 7 दिसंबर, 1705 ईसवी को चमकौर में वीरगति को प्राप्त हो गए। उन्होंने, स्वेच्छा से घिरे किले को छोड़ दिया और युद्ध के मैदान में मुगलों का सामना किया था। जुझार सिंह 14 साल की उम्र में 7 दिसंबर, 1705 ई. को चमकौर में ही वीरगति को प्राप्त हुए। इसके पश्चात जोरावर सिंह और उनके छोटे भाई फतेह सिंह को उनकी दादी माता गुजरी के साथ मुगलों ने पकड़ लिया। उन्हें मुगल आक्रांता औरंगजेब के आदेश पर मौत के घाट उतार दिया गया। क्रूर मुगलों ने उन्हें दीवारों में चुनवा दिया था। वीर गति प्राप्ति के समय जोरावर सिंह और फतेह सिंह की आयु क्रमश: 9 वर्ष और 6 वर्ष थी। इस बलिदान को भारतीय इतिहास में किसी भी युवा लड़के द्वारा धर्म के लिए सबसे बहादुर बलिदान के रूप में देखा जाता है।

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