… इसलिए महाराष्ट्र बंद से हुए नुकसान की भरपाई करे सरकार, पूर्व आईएएस-आईपीएस अधिकारियों ने की मांग

महाराष्ट्र के चार पूर्व आईएएस-आईपीएस अधिकारियों ने कहा है कि व्यसाय बंद कराना और सभी तरह के लेन-देन को रोकना, आम नागरिकों के मूल अधिकारों का उल्लंघन है। इसलिए महाविकास आघाड़ी के तीनों राजनीतिक दल इस बंद से हुए नुकसान के लिए जिम्मेदार हैं।

महाराष्ट्र में राज्य सरकार ने उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी कांड के विरोध में 11 अक्टूबर को ‘महाराष्ट्र बंद’ की घोषणा की थी। उस दौरान कई स्थानों पर हिंसा भी हुई थी। पूर्व प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों ने अब बॉम्बे उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर सरकार द्वारा प्रायोजित ‘महाराष्ट्र बंद’ को अवैध घोषित करने की मांग की है। इसमें पूर्व आईपीएस अधिकारी जूलियो रिबेरो, पूर्व प्रशासनिक अधिकारी डीएम सुकथनकर समेत चार अधिकारी शामिल हैं।

सत्ताधारी दलों से वसूला जाए मुआवजा
दायर याचिका में कहा गया गया है कि व्यसाय बंद कराना और सभी तरह के लेन-देन को रोकना, आम नागरिकों के मूल अधिकारों का उल्लंघन है। इसलिए महाविकास आघाड़ी के तीनों राजनीतिक दल इस बंद से हुए नुकसान के लिए जिम्मेदार हैं। याचिका में इन तीनों दलों से बंद के कारण हुए नुकसान के मुआवजे का भुगतान करने का आदेश देने की मांग की गई है। याचिका में उन लोगों के खिलाफ भी आपराधिक कार्रवाई की मांग की गई है, जिन्होंने बंद के दौरान जबरन दुकानें बंद करी दीं, नागरिकों को आनेजाने से रोका, उनके साथ मारपीट की तथा सार्वजनिक और निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया।

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अराजकता फैलने का आरोप
बॉम्बे उच्च न्यायालय में दायर याचिका में इन अधिकारियों ने कहा है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस तरह बंद की घोषणा कर अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे कानून और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करें। याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा है कि यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि सरकार की इस तरह की कार्रवाई समाज को अराजकता की ओर ले जाती है। याचिका में कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही फैसला सुनाया है कि किसी भी राजनीतिक दल द्वारा बुलाई गई हड़ताल असंवैधानिक है। इसके बावजूद राज्य में महाविकास आघाड़ी सरकार में शामिल राजनीतिक दलों द्वारा ’11 अक्टूबर’ को बंद का आह्वान किया गया। यह बड़ा मामला है।

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