इस तरह दम तोड़ रहा है किसान आंदोलन!

भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत और योगेंद्र यादव के साथ ही गुरनाम सिंह चढुनी जैसे किसान नेता अभी भी बड़े-बडे दावे कर रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि किसान आंदोलन दम तोड़ रहा है।

केंद्र सरकार के तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने तथा एमएसपी को लेकर कानून बनाने की मांग के लिए पिछले चार महीनों से ज्यादा समय से कुछ किसान संगठनों का प्रदर्शन जारी है। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत और योगेंद्र यादव के साथ ही गुरनाम सिंह चढुनी जैसे किसान नेता अभी भी बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि किसान आंदोलन दम तोड़ रहा है। अपनी जिद पर अड़े इन किसान नेताओं के लिए दिल्ली की सीमाओं के प्रदर्शन स्थलों पर लोगों को रोककर रखना मुश्किल हो रहा है। यहां लगातार भीड़ कम होने से इनकी चिंता बढ़ रही है।

पहले जहां इन स्थानों पर हजारों लोगों की भीड़ होती थी, वहीं अब चुनिंदा लोग ही प्रदर्शन स्थलों पर दिखाई पड़ रहे हैं। यही नहीं, प्रदर्शन स्थलों से बड़े किसान नेता भी नदारद हैं। किसानों के कम होते उत्साह को देखते हुए संयुक्त किसान मोर्चा ने मई में संसद मार्च करने की घोषणा की है। इसी बहाने वे किसानों में एक बार फिर जोश भरने की कोशिश कर रहे हैं। वे इस तरह एक बार फिर आंदोलन में जान फूंकने की कोशिश कर रहे हैं।

दलितों को जोड़ने की कोशिश
इसके साथ ही भारतीय किसान यूनियन ने दलितों को आंदोलन से जोड़ने की तैयारियां भी शुरू की कर दी हैं। संगठन ने 3 अप्रैल को हरियाणा के शहाबाद में उधम सिंह स्मारक परिसर में दलित व किसान महापंचायत बुलाई है। ज्यादा से ज्यादा लोगों को इस महापंचायत में बुलाने के लिए गांवों में प्रचार अभियान चलाया जा रहा है। इसके लिए किसानों के साथ ही दलितों के पास पहुंचकर उन्हें भी महापंचायत में आने का न्यौता दिया जा रहा है। अखिल भारतीय परिसंघ के अध्यक्ष डॉ उदित राज तीन कृषि कानूनों के विरोध में चलाए जा रहे आंदोलन को तेज करने के लिए ड्यूटी भी लगा सकते हैं।

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आगे की योजना
1.10 अप्रैल को केएमपी एक्सप्रेस को 24 घंटे के लिए जाम
2.5 अप्रैल को देश भर मे एफसीआई के 376 जिलो में मौजूद कार्यालयों के बाहर प्रदर्शन
3.आंबेडकर जयंती पर संविधान बचाओ दिवस मनाने का एलान
4.संसद मार्च के लिए तारीख की घोषण जल्द

 टिकैत के आंसुओं ने जिंदा किया आंदोलन
इसके बावजूद स्थिति देखकर लगता नहीं है कि किसानों का आंदोलन ज्यादा दिन तक जिंदा रह पाएगा। सच कहें तो यह आंदोलन तो 26 जनवरी की दिल्ली में किसानों की ट्रैक्टर रैली के दौरान हुई हिंसा के बाद ही समाप्त होने के करीब पहुंच गया था, लेकिन राकेश टिकैत के आंसूओं ने एक बार फिर से इस आंदोलन को जिंदा कर दिया। उन्होंने रोते हुए कहा था कि मैं जान दे दूंगा लेकिन जब तक हमारी मांगें नहीं मानी जातीं, तबतक मैं आंदोलन जारी रखूंगा।

बढ़ गया टिकैत का मनोबल
कई पार्टी नेताओं और किसान संगठनों के समर्थन तथा सहयोग मिलने के बाद टिकैत का मनोबल एक बार फिर बढ़ गया था। इसके बाद पंजाब में हुए निकाय चुनावों में कांग्रेस की मिली भारी जीत से तो टिकैत का मनोबल आसमान पर ही पहुंच गया। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की हार पर खुशी जताते हुए अगले कुछ महीनों के भीतर पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में होनेवाले विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ चुनाव प्रचार करने की घोषणा कर दी थी।

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टिकैत को थी उम्मीद
टिकैत की इस घोषणा से जहां विपक्षी पार्टियों की बांछे खिल गई थीं, वहीं भाजपा नेताओं की चिंता थोड़ी जरुर बढ़ी थी। देश की राजनीति पर नजर रखनेवाले विशेषज्ञों को भी लगा था कि अगर किसान आंदोलन को भाजपा के विरोध में खड़ा कर चुनाव प्रचार किया जाएगा, तो निश्चित रुप से इसका असर चुनाव परिणाम पर पड़ेगा। टिकैत भी इस बात से बहुत खुश थे कि उन्हें इसी बहाने अपने आंदोलन को जिंदा रखने में मदद मिलेगी।

धर्म संकट में पड़ गए टिकैत
टिकैत ने कई बार कहा था कि वे चुनावों में भाजपा को सबक सिखाएंगे, लेकिन जब मतदान की तारीखें तय हो गईं तो उनके सामने धर्मसंकट पैदा हो गया। हालांकि उन्होंने एक-दो बार यह जरुर कहा कि वे पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस पार्टी के लिए चुनाव प्रचार करेंगे, लेकिन कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों के तेवर देखकर उनका जोश ठंडा पड़ गया। उनकी समझ में ये बात आ गई कि मामला उतना आसान नहीं है, जितना उन्होंने सोच रखा था। वे किसी एक पार्टी का चुनाव प्रचार कर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और वामपंथी जैसी पार्टियों से नाराजगी मोल नही ले सकते थे। इस हालत में उन्होंने शांत बैठना ही उचित समझा।

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भारत बंद को प्रतिसाद नहीं
फिलहाल पांच प्रदेशों के चुनाव की वजह से केद्र की मोदी सरकार के मंत्री और नेता के साथ ही विपक्ष के नेता भी व्यस्त हो गए हैं। जबकि टिकैत के सभी दांव फेल होते दिख रहे हैं। बता दें कि 27 मार्च को संयुक्त किसान मोर्चा ने भारत बंद  की घोषाणा की थी, लेकिन उसका असर पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों में ही देखा गया। सच कहें तो भारत बंद को मिले ठंडे प्रतिसाद ने किसान आंदोलन की सच्चाई पर से पर्दा उठा दिया।

दम तोड़ता दिख रहा है आंदोलन
अब आंदोलन से जुड़े बड़े नेताओं के लिए इस आंदोलन को आगे जारी रखना बहुत बड़ी चुनौती है। वर्तमान में पार्टी नेताओं के साथ ही देश की जनता की नजर भी किसान आंदोलन से हटकर पांच राज्यों में कराए जा रहे चुनाव पर है। इस हालत में एनआरसी और सीएए के विरोध में दिल्ली के शाहीन बाग में हुए आंदोलन की तरह ही यह आंदोलन भी अपने आप दम तोड़ता दिख रहा है।

टिकैत के काफिले पर हमला
इस बीच राजस्थान के अलवर में राकेश टिकैत के काफिले पर हमला हुआ है। टिकैत ने इस हमले के पीछे भारतीय जनता पार्टी का हाथ बताया है। बता दें कि राजस्थान में कांग्रेस की सरकार है। इस हालत में यह भी सवाल पूछा जा रहा है कि कहीं ये टिकौत की किसान आंदोलन को टिकाए रखने की चाल तो नहीं है?

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