महाराष्ट्रः बप्पा भी देख रहे हैं नियमावली की राह!

बप्पा का आगमन सितंबर में होने वाला है। इसे लेकर लोगों के साथ ही बप्पा को भी राज्य सरकार की नियमावली का इंतजार है।

पूरे देश के साथ ही महाराष्ट्र में भी कोरोना संकट अभी भी बरकरार है। ऐसे में कोरोना कंट्रोल के लिए यहां की सरकार नए-नए नियम बना रही है। इन नियमों को लेकर सभी लोग उत्सुक रहते हैं, क्योंकि कोरोना काल में इन नियमों का प्रभाव सबके जीवन पर भी किसी न किसी रुप में पड़ता है। अब लोगों के साथ ही प्यारे बप्पा को भी राज्य सरकार की नियमावली का इंतजार है।

बप्पा का आगमन सितंबर में होने वाला है। हर वर्ष छह महीने पहले ही मूर्तिकार बप्पा की मूर्ति बनाने में जुट जाते थे, लेकिन इस वर्ष अभी इसका शुभारंभ नहीं हुआ है। इसका कारण यह है कि राज्य सरकार ने अभी तक बप्पा के आगमन के दिशानिर्देश जारी नहीं किए हैं।

पिछले साल से सबक
प्रदेश में पिछले साल कोरोना संकट के चलते गणेशोत्सव बहुत ही साधारण  ढंग से मनाया गया था। लेकिन इस साल हर कोई पारंपरिक तरीके से बप्पा का स्वागत करने की उम्मीद कर रहा है। हालांकि इस साल भी कोरोना की दूसरी लहर चल रही है, ऐसे में मूर्तिकार इस बात पर विचार कर रहे हैं कि बप्पा की मूर्ति कितनी फीट ऊंची होनी चाहिए।

सरकार कब जारी करेगी नियमावली?
पिछले साल कोरोना संकट के चलते कई मूर्तिकारों ने बप्पा की 3 फीट ऊंची प्रतिमा ही बनाने का निर्णय लिया था। इस कारण मूर्तिकारों का कहना है कि सरकार को जल्द से जल्द बप्पा की मूर्ति की ऊंचाई की घोषणा करनी चाहिए। बात यह है कि यदि मूर्तिकार बड़ी-बड़ी मूर्तियां बनाते हैं और सरकार बाद में कम ऊंचाई की मूर्ती बनाने की घोषणा करती है तो मूर्तिकारों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए मूर्तिकार मांग कर रहे हैं कि सरकार जल्द से जल्द नियम जारी करे।

पीओपी या मिट्टी की मूर्ति?
सरकार ने यह नहीं बताया है कि मूर्ति पीओपी की बनेगी या मिट्टी की। इसलिए यदि सरकार उस समय मिट्टी की मूर्ति बनाने का निश्चय करती है तो मिट्टी की मूर्तियां जल्दी बनाना संभव नहीं होगा। मिट्टी की मूर्ति को सूखने में कम से कम एक से डेढ़ महीने का समय लगता है, जिसके बाद पेंट का काम किया जाता है। लेकिन सरकार ने अभी तक इस मामले में कोई ठोस फैसला नहीं लिया है। इस कारण मूर्तिकार असमंजस में हैं।

आर्थिक संकट में मूर्तिकार
मूर्तिकार साल में एक बार कमाते हैं। इसी आमदनी से वे साल भर अपना गुजारा करते हैं। लेकिन पिछले साल केवल छोटी मूर्तियां ही बनाई गईं। इसके साथ ही लोगों में इस उत्सव के प्रति ज्यादा उत्साह भी नहीं देखा गया। इस कारण मूर्तिकारों का खर्च भी नहीं निकल पाया। बड़ी-बड़ी मूर्तियों में मूर्तिकार अपनी कला का प्रदर्शन करने के साथ-साथ अच्छा पैसा भी कमाते हैं। लेकिन पिछले साल बड़ी मूर्तियों पर प्रतिबंध लगाने से उन्हें लाखों रुपए का नुकसान हुआ। इसलिए इस बार वे कोई रिस्क नहीं लेना चाहते हैं।

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कई लोगों ने छोड़ दिया ये काम
हिंदुस्थान पोस्ट से बात करते हुए, प्रसिद्ध मूर्तिकार रेशमा खाटू ने कहा, “पिछले साल, हमने नुकसान में सरकार के साथ सहयोग किया। लेकिन इस साल, सरकार को पिछले साल के अंत में निर्णय की घोषणा करने की बजाय जल्द  करनी चाहिए। पिछले साल लागू किए गए नियमों के कारण हुए आर्थिक नुकसान से कई लोगों ने मूर्तिकला का काम छोड़ दिया। सरकार का निर्णय अब तक आ जाना चाहिए था, लेकिन अभी तक नहीं आया है।”

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ऊंचाई जल्द तय करनी चाहिए
मूर्तिकार प्रशांत देसाई का कहना है कि सरकार ने कोरोना काल में कई लोगों को अनुदान देने की घोषणा की है। लेकिन मूर्तिकार उनमें शामिल नहीं हैं। सरकार को विचार करना चाहिए कि साल में एक बार हमारी आमदनी होती है। हमने मुख्यमंत्री को भी पत्र लिखा है कि प्रतिमा की ऊंचाई सरकार तय करे।

मूर्तिकारों की उपेक्षा
मूर्तिकार गजानन तोंडवलकर का कहना है कि मिट्टी की मूर्तियां बनाने में कम से कम चार महीने लगते हैं। इसके साथ ही कच्चे माल जुटाने में भी समय लगता है। लेकिन सरकार ने अभी तक कोई नियम नहीं बनाया है। हम मूर्तिकारों की ये सरकार घोर उपेक्षा कर रही है।

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